अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ नवरात्र मेले के नौ दिन तक झूलों का पूरा किराया चुकाने के बाद शहरवासियों को आखिरी दिन आधे दाम पर झूला झूलने का ऑफर मिला है। नगर पालिका अध्यक्ष रमन डोंगरे ने स्थानीय लोगों के लिए झूलों का किराया आधा करने की घोषणा की है। इसके लिए बकायदा पोस्टर भी साझा किया गया है, जिसमें बड़े झूलों का किराया 30 रुपये और छोटे झूलों का 20 रुपये बताया गया है। शर्त यह है कि छूट का लाभ लेने के लिए डोंगरगढ़ के निवासी को अपना आधार कार्ड दिखाना होगा। लेकिन सवाल यह है कि जब मेला लगभग खत्म होने को है, तब इस राहत का ऐलान करने का औचित्य क्या है?
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नौ दिन तक फुल रेट, आखिरी दिन राहत का पोस्टर
डोंगरगढ़ का नवरात्र मेला हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को आकर्षित करता है। इस बार झूलों के किराये को लेकर लोगों के बीच नाराजगी की बात सामने आ रही है। आरोप है कि पूरे नौ दिनों तक झूलों का सामान्य किराया वसूला गया और कई झूलों की रेट लिस्ट में 80 से 100 रुपये तक के टिकट दर्ज थे। इस दौरान स्थानीय लोगों के लिए न तो पास व्यवस्था शुरू की गई और न ही झूलों के किराये में कोई विशेष छूट दी गई।

अब मेले के आखिरी दिन आधे किराये की घोषणा ने राहत से ज्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं। शहरवासियों की नाराजगी की वजह यही है कि अगर स्थानीय लोगों को सस्ती दर पर झूले उपलब्ध कराने की मंशा थी, तो इसका ऐलान मेला शुरू होने से पहले या शुरुआती दिनों में क्यों नहीं किया गया? समय रहते घोषणा होती तो बच्चों और परिवारों को पूरे मेले के दौरान इसका लाभ मिल सकता था।
आखिरी दिन की घोषणा से ज्यादातर दिनों में पूरा किराया चुकाने वाले परिवारों को कोई राहत नहीं मिलने वाली। ऐसे में आधे किराये का पोस्टर भले ही आकर्षक दिख रहा हो, लेकिन इसके समय ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

जब पास नहीं थे, तब भी किराया कम था!
पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष तरुण हत्थेल के कार्यकाल का हवाला देते हुए स्थानीय लोग मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। बताया जाता है कि उस समय पास व्यवस्था खत्म होने के बावजूद झूलों का किराया 20 से 30 रुपये के आसपास रखा गया था। मेला मैदान में मैटिंग कराए जाने से धूल की परेशानी कम करने की व्यवस्था भी की जाती थी। इसके उलट इस बार झूलों के किराये, मैदान की व्यवस्थाओं और स्थानीय दुकानदारों को अवसर देने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
मेले को लेकर एक और शिकायत स्थानीय दुकानदारों को मीना बाजार में पर्याप्त अवसर नहीं मिलने की है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि टेंडर और दुकानों के आवंटन में पसंदीदा लोगों को फायदा पहुंचाया गया। हालाँकि इस मामले पर जाँच के बाद ही कुछ कहना सही होगा लेकिन झूलों के किराये से लेकर दुकानों के आवंटन तक उठ रहे सवालों ने मेला प्रबंधन की पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है।
कांग्रेस पार्षद विनायक राव ने उठाए सवाल
कांग्रेस पार्षद विनायक राव ने नगर पालिका अध्यक्ष की घोषणा को निंदनीय बताया है। उनका कहना है कि यदि शहर की जनता को लाभ देना था, तो इसकी घोषणा पहले की जानी चाहिए थी, ताकि स्थानीय लोग पूरे मेले के दौरान इसका फायदा उठा पाते। राव ने मेले में अव्यवस्थाओं और मीना बाजार के टेंडर व दुकानों के आवंटन में कथित अनियमितताओं के आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिन छूट की घोषणा करके पहले से उठ रहे सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है।
मेले के आखिरी दिन जारी हुआ छूट का पोस्टर अब चर्चा का विषय बन गया है। सवाल यह नहीं कि स्थानीय लोगों को सस्ता टिकट मिलना चाहिए या नहीं,इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो। असली सवाल यह है कि राहत की घोषणा ऐसे समय क्यों की गई, जब उसका लाभ लेने के लिए बस एक ही दिन का समय बचा है। अगर उद्देश्य स्थानीय परिवारों को सस्ती दर पर मनोरंजन उपलब्ध कराना था, तो इसकी शुरुआत पहले दिन से क्यों नहीं हुई?
फिलहाल, नगर पालिका अध्यक्ष की घोषणा पर उठ रहे सवालों का जवाब पालिका प्रबंधन को देना चाहिए। साथ ही, मीना बाजार के टेंडर, दुकान आवंटन और झूलों के किराये से जुड़े आरोपों पर भी पारदर्शी जानकारी सामने आनी चाहिए। क्योंकि जनता को सिर्फ आखिरी दिन का सस्ता टिकट नहीं, पूरे मेले में बेहतर व्यवस्था और समय पर राहत चाहिए। वरना नौ दिन तक पूरे पैसे देने के बाद दसवें दिन मिलने वाला आधे किराये का ऑफर राहत कम और ‘देर से आई मेहरबानी’ ज्यादा नजर आएगा।
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