दिल्ली में यमुना नदी के प्रदूषण का मुद्दा एक बार फिर चिंता का विषय बन गया है। नदी में अमोनिया का स्तर लगातार बढ़ने से पेयजल आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बना हुआ है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के मुताबिक, यमुना की तलहटी में जमा गाद और नदी में ऊपर की ओर से नालों के जरिए पहुंचने वाला प्रदूषित पानी अमोनिया के स्तर में बार-बार बढ़ोतरी के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसके चलते दिल्ली में अक्सर पानी की सप्लाई बाधित होती है।

यमुना में अमोनिया बढ़ना क्यों है चिंता की बात?

यमुना में अमोनिया की मात्रा बढ़ने से पानी को पेयजल के रूप में इस्तेमाल करने से पहले उसका शोधन करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। दिल्ली को यमुना से मिलने वाले पानी को विभिन्न जल शोधन संयंत्रों में साफ किया जाता है। जब कच्चे पानी में अमोनिया का स्तर बढ़ जाता है, तो जल शोधन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और संयंत्रों को पानी का उत्पादन कम करना या अस्थायी रूप से रोकना पड़ सकता है। इसका सीधा असर दिल्ली के उन इलाकों पर पड़ सकता है, जहां जलापूर्ति के लिए प्रभावित संयंत्रों पर निर्भरता है।

वजीराबाद जलाशय की गाद भी हो सकती है वजह

CPCB की प्रारंभिक जांच के मुताबिक, वजीराबाद जलाशय की तलहटी में जमा गाद के सड़ने से अमोनिया पैदा हो सकता है। अगस्त 2026 में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, CPCB ने अमोनिया का स्तर बढ़ने के दौरान जलाशय से नमूने एकत्र किए थे। प्रारंभिक निष्कर्षों में गाद को अमोनिया बढ़ने का संभावित कारण बताया गया है। इसके अलावा, यमुना में ऊपर की ओर से आने वाले नालों के पानी में भी अमोनिया की अधिक मात्रा पाई गई। ऐसे में नदी में प्रदूषित पानी का प्रवाह और तलहटी में जमा गाद, दोनों ही समस्या को बढ़ा सकते हैं।

गाद जमा होने से बढ़ रहा अमोनिया

अपर यमुना रिवर बोर्ड (UYRB) को सौंपी गई एक रिपोर्ट में CPCB ने वजीराबाद और चंद्रावल जल उपचार संयंत्रों के लिए कच्चा पानी उपलब्ध कराने वाले जलाशय क्षेत्र में गाद और मिट्टी के अत्यधिक जमाव पर चिंता जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जलाशय की तलहटी में जमा गाद में मौजूद जैविक पदार्थों के अपघटन से अमोनिया पैदा हो सकता है। इससे नदी के पानी में अमोनिया की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है। जब कच्चे पानी में अमोनिया का स्तर बढ़ता है, तो जल उपचार संयंत्रों के लिए उसे निर्धारित मानकों के अनुरूप साफ करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सिर्फ गाद निकालने से नहीं होगा समस्या का समाधान

CPCB ने चेतावनी दी है कि जलाशय से गाद निकालने यानी ड्रेजिंग से ही इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इसके लिए नदी में प्रदूषित पानी पहुंचाने वाले स्रोतों पर भी नियंत्रण करना जरूरी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नालों के जरिए यमुना में छोड़े जाने वाले पानी में नाइट्रोजन की मात्रा को निर्धारित सीमा के भीतर लाना होगा। यदि नालों से नाइट्रोजनयुक्त प्रदूषित पानी लगातार नदी में पहुंचता रहेगा, तो गाद हटाने के बाद भी अमोनिया का स्तर दोबारा बढ़ सकता है।

वजीराबाद और चंद्रावल जल संयंत्रों पर पड़ सकता है असर

दिल्ली की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में वजीराबाद और चंद्रावल जल उपचार संयंत्रों की अहम भूमिका है। इन संयंत्रों को मिलने वाले कच्चे पानी में अमोनिया की मात्रा बढ़ने पर जल शोधन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में संयंत्रों को पानी का उत्पादन कम करना पड़ सकता है, जिसका असर दिल्ली के विभिन्न इलाकों में जलापूर्ति पर पड़ सकता है। यही वजह है कि यमुना में अमोनिया का बार-बार बढ़ना दिल्ली की जल व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक, नदी के पानी में अमोनिया बढ़ने के पीछे नालों से आने वाले प्रदूषित पानी और जलाशय में जमा गाद, दोनों की भूमिका है। ऐसे में केवल जलाशय से गाद निकालने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। अपर यमुना रिवर बोर्ड (UYRB) ने पहले CPCB से अध्ययन करने को कहा था कि जलाशय में जमा गाद का अमोनिया का स्तर बढ़ने और जलापूर्ति बाधित होने से क्या संबंध है। अध्ययन के बाद सामने आया कि गाद के साथ-साथ नालों से आने वाले पानी में अमोनिया और नाइट्रोजन की अधिक मात्रा भी समस्या को बढ़ा रही है।

गाद निकालने से क्यों नहीं होगा स्थायी समाधान?

एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक, अध्ययन में पाया गया कि जलाशय में जमा गाद और नालों से आने वाला प्रदूषित पानी, दोनों कच्चे पानी में अमोनिया की मात्रा बढ़ाने के कारण हैं। CPCB का कहना है कि यदि जलाशय से एक बार गाद निकाल भी दी जाती है, तो इससे लंबे समय तक राहत मिलने की गारंटी नहीं है। नालों से लगातार आने वाले नाइट्रोजनयुक्त प्रदूषित पानी के कारण गाद दोबारा जमा हो सकती है और अमोनिया बढ़ने की समस्या फिर सामने आ सकती है। इसलिए केवल जलाशय की सफाई के बजाय प्रदूषण के मूल स्रोतों पर नियंत्रण करना जरूरी है।

CPCB ने बताया समस्या का समाधान

CPCB के अनुसार, यमुना में अमोनिया की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण के लिए नालों से नदी में पहुंचने वाले पानी में नाइट्रोजन की मात्रा को निर्धारित सीमा के भीतर लाना होगा।

इसके लिए जरूरी कदम हैं:

सीवेज का उचित शोधन: नालों में छोड़े जाने वाले घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट जल का पर्याप्त उपचार सुनिश्चित करना।

औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण: औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल की निगरानी और निर्धारित मानकों का पालन कराना।

गाद की नियमित निगरानी: जलाशय में गाद के जमाव और उसकी संरचना का आकलन करना तथा जरूरत के अनुसार सफाई करना।

प्रदूषण स्रोतों की पहचान: नालों से आने वाले पानी में नाइट्रोजन और अमोनिया की मात्रा की नियमित जांच करना।

वजीराबाद और चंद्रावल प्लांट से किन इलाकों में होती है सप्लाई?

यमुना से लिया गया कच्चा पानी वजीराबाद और चंद्रावल जल उपचार संयंत्रों में पहुंचता है। यहां पानी को शोधित करने के बाद दिल्ली के मध्य, उत्तर और पुरानी दिल्ली के विभिन्न इलाकों में आपूर्ति की जाती है। जब कच्चे पानी में अमोनिया का स्तर बढ़ जाता है, तो उसे निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप शुद्ध करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसी स्थिति में जल उपचार संयंत्रों को पानी का उत्पादन घटाना या कुछ समय के लिए रोकना पड़ सकता है। इसका असर संबंधित इलाकों की जलापूर्ति पर पड़ता है।

पानीपत और सोनीपत के औद्योगिक प्रदूषण पर सवाल

दिल्ली जल बोर्ड का कहना है कि पानीपत के औद्योगिक नालों से डाई, क्लोराइड और अमोनिया युक्त रसायनों जैसे प्रदूषक यमुना में पहुंचते हैं। इससे नदी के पानी में अमोनिया का स्तर बढ़ने की आशंका रहती है और दिल्ली में जल शोधन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। DJB ने सोनीपत का मुद्दा भी उठाया है। उसके मुताबिक, वहां साफ पानी और औद्योगिक पानी ले जाने वाली दो नहरें एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं। इन दोनों के बीच रेत की एक पतली दीवार है, जिससे पानी के आपस में मिलने की आशंका को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। हालांकि, इन स्थानों से आने वाले प्रदूषण की वास्तविक मात्रा और अमोनिया के स्तर में उनकी हिस्सेदारी निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक जांच और निगरानी के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।

हरियाणा ने बताया प्रदूषण रोकने के लिए क्या हो रहा है

अपर यमुना रिवर बोर्ड (UYRB) के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट में हरियाणा ने कहा है कि यमुना में गिरने वाले नालों से प्रदूषण कम करने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। इनमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का निर्माण भी शामिल है। हरियाणा के अनुसार, इस कार्यक्रम की निगरानी केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से की जा रही है। इन प्रयासों का उद्देश्य नालों से नदी में पहुंचने वाले प्रदूषित पानी को कम करना और यमुना की गुणवत्ता में सुधार लाना है। यमुना में अमोनिया का स्तर बार-बार बढ़ने की समस्या के स्थायी समाधान के लिए औद्योगिक अपशिष्ट और सीवेज के शोधन के साथ-साथ दोनों राज्यों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

वजीराबाद जलाशय में गाद से घट गई पानी जमा करने की क्षमता

यमुना के प्रदूषण के अलावा वजीराबाद जलाशय में जमा गाद भी दिल्ली की जलापूर्ति के लिए चिंता का विषय है। वजीराबाद बैराज से बना यह जलाशय लगभग 2.5 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है। इसकी मूल गहराई करीब 8.20 फीट यानी 2.5 मीटर बताई जाती है। लेकिन जलाशय में लगातार गाद और मिट्टी जमा होने के कारण इसकी वास्तविक गहराई घटकर लगभग 1 से 1.5 मीटर रह गई है। इससे जलाशय की पानी संग्रह करने की क्षमता काफी कम हो गई है। गाद जमा होने से जलाशय के प्रभावी उपयोग पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, तलहटी में जमा जैविक पदार्थों के अपघटन से अमोनिया पैदा होने की संभावना भी जताई गई है।

सिर्फ गाद हटाने से नहीं सुलझेगी समस्या

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमोनिया की समस्या के पीछे जलाशय में जमा गाद और नालों से आने वाला नाइट्रोजनयुक्त प्रदूषित पानी, दोनों की भूमिका हो सकती है। ऐसे में जलाशय से गाद निकालना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसे अकेले स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। जब तक नालों से आने वाले पानी में नाइट्रोजन और अमोनिया की मात्रा को निर्धारित सीमा के भीतर नहीं लाया जाता, तब तक समस्या दोबारा पैदा होने का खतरा बना रहेगा।

दिल्ली की जलापूर्ति पर क्यों पड़ता है असर?

यमुना से मिलने वाला कच्चा पानी वजीराबाद और चंद्रावल जल उपचार संयंत्रों में पहुंचता है। यहां पानी को शोधित करने के बाद दिल्ली के मध्य, उत्तर और पुरानी दिल्ली के कई इलाकों में आपूर्ति की जाती है। जब कच्चे पानी में अमोनिया की मात्रा बढ़ जाती है, तो जल शोधन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में संयंत्रों को उत्पादन कम करना या अस्थायी रूप से रोकना पड़ सकता है, जिससे लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए यमुना में अमोनिया की समस्या का समाधान दिल्ली और हरियाणा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह सकता। औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण, सीवेज शोधन, जलाशय से गाद हटाने और पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी जैसे उपायों पर प्रभावी तरीके से काम करना जरूरी है।

नालों से आने वाला नाइट्रोजनयुक्त पानी कैसे बढ़ाता है अमोनिया?

नालों से यमुना में पहुंचने वाले प्रदूषित पानी में नाइट्रोजन के विभिन्न यौगिक मौजूद हो सकते हैं। नाइट्रेट और नाइट्राइट नाइट्रोजन के ऐसे ही रूप हैं। नदी और जलाशय में होने वाली जैविक एवं रासायनिक प्रक्रियाओं के दौरान नाइट्रोजनयुक्त पदार्थों से अमोनिया बन सकता है। जब ये प्रदूषक नदी की तलहटी में जमा गाद में पहुंचते हैं, तो वहां मौजूद जैविक पदार्थों के अपघटन से अमोनिया बनने की प्रक्रिया जारी रह सकती है। इस कारण जलाशय में अमोनिया का स्तर बार-बार बढ़ने का खतरा बना रहता है।

मानसून के बाद गाद निकालने की तैयारी

दिल्ली जल बोर्ड (DJB) ने इस साल मानसून के बाद वजीराबाद बैराज के पास स्थित जलाशय क्षेत्र से गाद निकालने की योजना की घोषणा की है। लंबे समय से गाद जमा होने के कारण जलाशय की पानी संग्रह करने की क्षमता प्रभावित होने की चिंता भी जताई जाती रही है। हालांकि, अपर यमुना रिवर बोर्ड (UYRB) ने सुझाव दिया है कि जलाशय की गाद निकालने की कार्रवाई तब की जानी चाहिए, जब नालों से आने वाले प्रदूषण का स्तर स्वीकार्य सीमा के भीतर आ जाए।

सिर्फ गाद निकालने से क्यों नहीं बदलेगी स्थिति?

एक अधिकारी के मुताबिक, CPCB ने दिल्ली को बताया है कि जलाशय से गाद निकालने के बाद भी यदि नालों से प्रदूषित पानी यमुना में आता रहा, तो समस्या दोबारा पैदा हो सकती है।

इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:

प्रदूषण का लगातार प्रवाह: नालों से नाइट्रोजनयुक्त प्रदूषित पानी नदी में पहुंचता रहेगा।

गाद का दोबारा जमाव: पानी के साथ आने वाले ठोस और जैविक पदार्थ जलाशय की तलहटी में फिर जमा हो सकते हैं।

अमोनिया बनने की प्रक्रिया जारी रहना: जमा गाद में मौजूद नाइट्रोजनयुक्त पदार्थों के अपघटन से दोबारा अमोनिया पैदा हो सकता है।

दिल्ली की जलापूर्ति पर क्या होगा असर?

यमुना से मिलने वाला कच्चा पानी वजीराबाद और चंद्रावल जल उपचार संयंत्रों में शोधित किया जाता है। इन संयंत्रों से दिल्ली के मध्य, उत्तर और पुरानी दिल्ली के कई इलाकों में पानी की आपूर्ति होती है। जब कच्चे पानी में अमोनिया की मात्रा बढ़ जाती है, तो जल शोधन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में संयंत्रों को पानी का उत्पादन घटाना या अस्थायी रूप से रोकना पड़ सकता है, जिससे लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।

स्थायी समाधान के लिए क्या करना होगा?

यमुना में अमोनिया की समस्या से निपटने के लिए जलाशय की सफाई के साथ-साथ नालों से आने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना जरूरी है। इसके लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता और कार्यप्रणाली में सुधार, औद्योगिक अपशिष्ट जल की निगरानी और नाइट्रोजन की मात्रा की नियमित जांच जैसे कदम महत्वपूर्ण होंगे। CPCB और UYRB के सुझावों का मुख्य उद्देश्य यह है कि गाद निकालने की कार्रवाई तभी दीर्घकालिक लाभ दे, जब नदी में प्रदूषित पानी का प्रवाह भी नियंत्रित किया जाए। अन्यथा जलाशय की सफाई पर खर्च करने के बावजूद अमोनिया बढ़ने और दिल्ली की जलापूर्ति प्रभावित होने की समस्या फिर सामने आ सकती है।

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