Business Desk – Crude Oil Price Today: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है। गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को सुबह 9 बजे ब्रेंट क्रूड 1.61% की तेजी के साथ 110.569 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 1.31% चढ़कर 98.455 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को लेकर अनिश्चितता, तेल की सप्लाई में रुकावट और समुद्री रास्तों पर हमलों की खबरों ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत के आयात बिल, महंगाई और आम लोगों के बजट पर दबाव बढ़ सकता है।
ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार क्यों पहुंचा?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को मजबूती मिलने की प्रमुख वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। सऊदी अरब में एयरपोर्ट और तेल रिफाइनरियों पर हमलों की खबरों के साथ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक तेल व्यापार का एक अहम समुद्री रास्ता है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई घटने का खतरा पैदा हो सकता है। इसी आशंका के कारण निवेशक तेल की उपलब्धता और परिवहन पर नजर बनाए हुए हैं।
इसके अलावा, रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष और ड्रोन हमलों से भी भू-राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। बाजार में आशंका है कि तनाव बढ़ने पर तेल उत्पादन और सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका-ईरान बातचीत पर क्यों टिकी हैं नजरें?
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को लेकर अब तक स्पष्टता नहीं है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान की कुछ शर्तों को खारिज करते हुए उसके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद अमेरिका की ओर से रखे गए प्रस्ताव पर ईरान के जवाब का इंतजार बना हुआ है।
बातचीत आगे बढ़ती है या तनाव और गहराता है, इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। तनाव कम होने और सप्लाई सामान्य रहने की उम्मीद से कीमतों पर दबाव आ सकता है। इसके उलट, नए हमलों या सप्लाई बाधित होने की आशंका से तेल महंगा हो सकता है।
दो सप्ताह में 18 से ज्यादा जहाजों पर हमले
तेल बाजार से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराने वाली कंपनी Kpler के हवाले से बताया गया है कि दो सप्ताह के दौरान प्रमुख समुद्री मार्गों पर 18 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया गया। ओमान की खाड़ी तक जहाजों पर हमलों की खबरों ने भी समुद्री परिवहन की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है।
जहाजों पर हमलों का असर केवल तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। इससे बीमा, माल ढुलाई और परिवहन लागत भी बढ़ सकती है। अगर कंपनियों को सुरक्षित रास्तों के लिए लंबा समुद्री मार्ग अपनाना पड़े, तो डिलीवरी में देरी और लागत बढ़ने का जोखिम रहता है।
क्या कच्चा तेल महंगा होने से बढ़ेंगी ब्याज दरें?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी रहने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। तेल महंगा होने पर परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ता है।
अमेरिका में महंगाई बढ़ने पर फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपना सकता है। हालांकि, ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला केवल तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करता। महंगाई, रोजगार और आर्थिक विकास समेत कई संकेतकों को देखकर केंद्रीय बैंक निर्णय लेते हैं।
भारत में भी महंगाई और आर्थिक वृद्धि को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मौद्रिक नीति तय करता है। कच्चे तेल की तेजी अपने आप ब्याज दरों में बढ़ोतरी की पुष्टि नहीं करती।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
आम लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ टैक्स, रुपये की विनिमय दर और अन्य कारकों पर भी निर्भर करते हैं। इसलिए कच्चा तेल महंगा होने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे।
फिलहाल निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान बातचीत, पश्चिम एशिया में सुरक्षा हालात और तेल की सप्लाई पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में यही कारक तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है या बाजार को राहत मिलती है।

