Business Desk – Crude Oil Price Today : कच्चे तेल की कीमतों में आज यानी 18 सितंबर 2026 को लगातार तीसरे दिन गिरावट देखने को मिल रही है। शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में WTI क्रूड करीब 101 डॉलर प्रति बैरल और Brent क्रूड करीब 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा।

सऊदी अरब की अहम पाइपलाइन को जल्द आंशिक रूप से दोबारा शुरू करने की तैयारी और मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई को लेकर चिंता कम होने से कीमतों पर दबाव आया है। हालांकि, क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और कच्चा तेल अभी भी 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है।

तेल की कीमतों में यह गिरावट भारत के लिए थोड़ी राहत देने वाली हो सकती है, लेकिन फिलहाल इसे बड़ी राहत नहीं माना जा सकता। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है और 100 डॉलर से ऊपर का क्रूड आयात बिल, तेल कंपनियों के मार्जिन और महंगाई पर दबाव बनाए रखता है।

शांति वार्ता की उम्मीद से भी तेल पर दबाव

मिडिल ईस्ट के तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों के संकेत भी कच्चे तेल के बाजार को प्रभावित कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले सप्ताह न्यूयॉर्क में खाड़ी देशों के नेताओं से मुलाकात करने की संभावना की खबरों से बाजार में यह उम्मीद बनी है कि तनाव कम करने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं। हालांकि, अभी किसी स्थायी शांति समझौते को लेकर स्पष्टता नहीं है।

सऊदी अरब की पाइपलाइन फिर शुरू होने से सप्लाई की चिंता घटी

सऊदी अरब की East-West पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के बाद सप्लाई बाधित हुई थी। अब सऊदी अरब कुछ ही दिनों में इसकी करीब आधी क्षमता बहाल करने की तैयारी में है। पूरी क्षमता तक पहुंचने में करीब छह सप्ताह लगने का अनुमान है।

इसके अलावा सऊदी अरब ओमान के रास्ते एशिया को अतिरिक्त कच्चा तेल भेजने की कोशिश भी कर रहा है। इससे बाजार में तत्काल Supply Risk कुछ कम हुआ है।

हालांकि, Strait of Hormuz से जुड़े जोखिम और मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण सप्लाई को लेकर अनिश्चितता अभी बनी हुई है। इसलिए मामूली गिरावट के बावजूद तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत दुनिया के बड़े Crude Oil Importer देशों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने या घटने का असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है। हालिया तेजी के दौरान भारतीय कच्चे तेल की टोकरी की कीमत 9 सितंबर को करीब 115.98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इससे तेल कंपनियों के Fuel Marketing Margin पर दबाव बढ़ा था।

अब WTI और Brent में गिरावट से भारतीय तेल कंपनियों को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन कीमतें अभी भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर हैं, इसलिए दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 18 सितंबर को देश के प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें भी स्थिर रहीं।

पेट्रोल-डीजल के दाम अभी स्थिर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के बावजूद 18 सितंबर को दिल्ली, मुंबई समेत प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम में बदलाव नहीं हुआ। सरकारी तेल कंपनियां रोजाना सुबह 6 बजे कीमतों की समीक्षा करती हैं।

तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती है और घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ते हैं, तो Oil Marketing Companies यानी OMCs के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। विश्लेषकों के मुताबिक सितंबर में पेट्रोल और डीजल की मार्केटिंग मार्जिन पर नुकसान का दबाव बना हुआ है।

तेल कंपनियों को पहले ही बड़ा नुकसान

कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और घरेलू ईंधन कीमतों में बदलाव नहीं होने से सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ा है। 2026 की अप्रैल-जून तिमाही में तीन सरकारी OMCs को मिलाकर करीब 74,781 करोड़ रुपए का नुकसान दर्ज किया गया था। विश्लेषकों ने कहा है कि अगर क्रूड लंबे समय तक 95-100 डॉलर से ऊपर रहता है तो कंपनियों के मार्जिन पर और दबाव पड़ सकता है।

महंगाई पर भी असर पड़ सकता है

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट भारत के लिए सकारात्मक संकेत हो सकती है, क्योंकि इससे आगे चलकर आयात लागत और ईंधन से जुड़े खर्च पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट में फिर तनाव बढ़ता है और तेल की सप्लाई बाधित होती है, तो कीमतें दोबारा तेजी पकड़ सकती हैं। इसका असर पेट्रोल-डीजल के अलावा Transport Cost, Manufacturing और Inflation पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल बाजार की नजर सऊदी पाइपलाइन की बहाली, Strait of Hormuz की स्थिति और मिडिल ईस्ट में चल रही कूटनीतिक कोशिशों पर है। तेल की कीमतों में दो-तीन दिन की गिरावट के बावजूद 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर क्रूड का बने रहना भारत के लिए अभी भी अहम चिंता है।