कुंदन कुमार, पटना। बिना किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) के सदस्य बने मंत्री पद की शपथ लेने वाले दीपक प्रकाश का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। आज इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
संविधान के जानकारों और याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिना सदन की सदस्यता के किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मंत्री पद पर बनाए रखना संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है। इसी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद अदालत ने बिहार सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। आज कोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को अपना पक्ष रखना होगा कि आखिर किस परिस्थिति के तहत यह कदम उठाया गया।
सरकार का नया दांव और राजनीतिक सरगर्मी
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद से ही बिहार के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। कानूनी शिकंजा कसता देख बिहार सरकार और सत्तारूढ़ दल ने इस विवाद से बाहर निकलने के लिए एक नया सियासी रास्ता निकाला है।
विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद भाजपा के एक मौजूदा विधान पार्षद देवेश कुमार से इस्तीफा करवा लिया गया है। इस इस्तीफे के बाद विधान परिषद की वह सीट खाली हो चुकी है। अब सरकार इसी खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य बनाकर भेजने की पूरी तैयारी कर चुकी है, ताकि उनकी सदस्यता से जुड़ा कानूनी विवाद हमेशा के लिए खत्म किया जा सके।
आज की सुनवाई पर टिकी नजरें
आज सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई बेहद अहम साबित होने वाली है। अदालत के समक्ष यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर क्या सफाई पेश करती है। क्या सरकार कोर्ट को यह बताएगी कि मंत्री पद की अर्हता को पूरा करने के लिए अब वैकल्पिक व्यवस्था (विधान परिषद चुनाव/मनोनयन) कर ली गई है?
यदि सरकार की तरफ से संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई सख्त टिप्पणी या आदेश भी सामने आ सकता है। यही वजह है कि आज की अदालत की कार्यवाही पर विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के तमाम बड़े नेताओं की भी पैनी नजर बनी हुई है।


