दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में महिला की सास और ननदों को आरोपमुक्त करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस मधु जैन की पीठ ने 1 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में कहा कि आरोपों में संबंधित महिलाओं की अलग-अलग भूमिका का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोप सामान्य प्रकृति के थे और प्रत्येक आरोपी की कथित भूमिका को अलग से स्पष्ट नहीं किया गया था। ऐसे में सास और ननदों को आरोपमुक्त करने के निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। हाईकोर्ट ने मामले में सभी आरोपियों को क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट (आपराधिक विश्वासघात) के आरोप से आरोपमुक्त करने के फैसले को भी बरकरार रखा।
हर आरोपी की भूमिका स्पष्ट करना जरूरी
रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब किसी वैवाहिक विवाद में कई रिश्तेदारों के खिलाफ आरोप लगाए जाते हैं, तो शिकायतकर्ता को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किस व्यक्ति पर क्या आरोप है और उसकी कथित भूमिका क्या रही। इस मामले में दहेज की मांग, ताने मारने और परेशान करने जैसे आरोप अधिकांश आरोपियों पर सामूहिक रूप से लगाए गए थे। वहीं, 55 हजार रुपये के भुगतान और मारपीट जैसी घटनाओं का उल्लेख विशेष रूप से पति से जुड़ा था।
हर अप्रिय घटना कानूनी तौर पर ‘क्रूरता’ नहीं
कोर्ट ने सास पर लगाए गए उस आरोप पर भी गौर किया, जिसमें कहा गया था कि शिकायतकर्ता की शारीरिक स्थिति के बावजूद उससे घर का काम कराया जाता था। अदालत ने कहा कि यह आरोप दहेज की मांग से संबंधित नहीं था और केवल इस आधार पर इसे कानूनी तौर पर ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ससुराल में होने वाली हर असंवेदनशील या आपत्तिजनक घटना अपने आप कानूनी ‘क्रूरता’ नहीं बन जाती। इसके लिए मामले के तथ्यों और आरोपों को संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत परखा जाना जरूरी है। अदालत ने मेडिकल रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया। रिकॉर्ड में मिसकैरेज को स्वाभाविक रूप से हुआ बताया गया था। साथ ही, एक ननद के खिलाफ जबरन दवाएं दिए जाने के आरोप के संबंध में मेडिकल रिकॉर्ड में उस समय का कोई तत्काल विवरण दर्ज नहीं था। कोर्ट ने इन तथ्यों को भी आरोपों की समीक्षा करते समय ध्यान में रखा।
धारा 406 के आरोप के लिए क्या कहा कोर्ट ने?
आईपीसी की धारा 406 आपराधिक विश्वासघात से संबंधित है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसके गहने, नकद, फिक्स्ड डिपॉजिट, घरेलू सामान और कपड़े ससुराल वालों के पास रह गए और उन्हें वापस नहीं किया गया। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है कि संपत्ति आरोपियों को सौंपी गई थी। कोर्ट के मुताबिक, शिकायत में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस आरोपी को कौन-सी संपत्ति सौंपी गई थी और वह आरोपी उस संपत्ति को वापस करने के लिए किस तरह जिम्मेदार था। साथ ही, तथ्यों से यह भी सामने आना चाहिए कि संबंधित आरोपी ने कथित संपत्ति पर कब्जा कैसे हासिल किया और उसे अपने पास रखने या वापस करने की क्या जिम्मेदारी थी।
सेशंस कोर्ट के फैसले को महिला ने दी थी चुनौती
इस मामले में जून 2010 में मजिस्ट्रेट ने सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था। बाद में सेशंस कोर्ट ने महिला के ससुर, सास और ननदों को धारा 498-A और 406 के तहत आरोपों से आरोपमुक्त कर दिया, जबकि पति के खिलाफ धारा 498-A का मामला बनाए रखा। पति को धारा 406 के आरोप से भी मुक्त कर दिया गया था। महिला ने सेशंस कोर्ट के इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान 15 दिसंबर 2022 को साकेत की एक अदालत ने महिला के पति को धारा 498-A के तहत भी बरी कर दिया था। इसके बाद मामले में हाईकोर्ट के समक्ष आरोपों और निचली अदालतों के आदेशों पर विचार किया गया।
क्या था पूरा मामला?
कोर्ट के आदेश के मुताबिक, शिकायतकर्ता महिला की शादी फरवरी 2003 में हुई थी। 21 फरवरी को वह दिल्ली के नारायणा स्थित अपने ससुराल गई थी। महिला ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद ही उसके पति और ससुराल वालों ने 5 लाख रुपये और मारुति एस्टीम कार की मांग शुरू कर दी। कम दहेज लाने का आरोप लगाकर उसे कथित तौर पर परेशान किया जाने लगा। महिला के मुताबिक, गर्भवती होने के बाद उसकी एक ननद ने जरूरी न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स बताकर उसे कुछ दवाएं दीं। दवाएं लेने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई और 11 फरवरी 2004 को उसका गर्भपात हो गया। उसने आरोप लगाया कि इस दौरान इलाज की उचित व्यवस्था नहीं की गई और उसके पति ने जरूरी चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के लिए भी सहमति नहीं दी। महिला ने आगे आरोप लगाया कि मई 2004 में उसे ससुराल से निकाल दिया गया। इसके बाद उसने सितंबर 2004 में वीमेन सेल में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर मालवीय नगर थाने में आईपीसी की धारा 498-A, 406 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया। मामले में पुलिस ने जून 2006 में चार्जशीट दाखिल की थी।
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