उत्तराखंड सरकार सितंबर में विकसित उत्तराखंड-2047 का विजन डॉक्यूमेंट पेश करने की तैयारी में है. सेतु आयोग ने शोध, आंकड़ों के विश्लेषण और विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर राज्य के दीर्घकालिक विकास का रोडमैप तैयार किया है.

देहरादून. उत्तराखंड सरकार सितंबर में ‘विकसित उत्तराखंड-2047’ का विजन डॉक्यूमेंट पेश करने की तैयारी कर रही है. राज्य को वर्ष 2047 तक विकसित बनाने के लक्ष्य के तहत तैयार किए जा रहे इस दस्तावेज में दीर्घकालिक विकास की दिशा, प्राथमिकताएं और परिणामों को मापने का ढांचा तय किया जाएगा.

इस विजन डॉक्यूमेंट को तैयार करने में राज्य के नीति सलाहकारी संस्थान सेतु आयोग की अहम भूमिका है. आयोग ने विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन, आंकड़ों के विश्लेषण, विशेषज्ञों और संबंधित संस्थानों के साथ विमर्श तथा मौजूदा योजनाओं के मूल्यांकन के आधार पर नीतिगत सुझाव और सिफारिशें तैयार की हैं.

विकास की प्राथमिकताएं

विजन-2047 की तैयारी में राज्य की मौजूदा आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों के साथ भविष्य की चुनौतियों का भी अध्ययन किया जा रहा है. इसके अलावा यह पहचानने पर जोर है कि आने वाले वर्षों में किन क्षेत्रों को उत्तराखंड के विकास का प्रमुख इंजन बनाया जा सकता है.

राज्य में इससे पहले विजन-2030 जैसे दस्तावेज तैयार किए जा चुके हैं. इस बार 2047 तक की अवधि के लिए अधिक डेटा आधारित, परिणाम केंद्रित और समय-समय पर समीक्षा किए जा सकने वाले ढांचे पर जोर दिया जा रहा है.

कई क्षेत्रों पर अध्ययन

सेतु आयोग के अध्ययन में अर्थव्यवस्था, रोजगार और कौशल विकास के अलावा स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पर्यटन, शहरीकरण, अवसंरचना, पलायन, पर्यावरण और डिजिटल गवर्नेंस को शामिल किया गया है. उद्देश्य केवल सामान्य लक्ष्य निर्धारित करना नहीं, बल्कि उनके लिए स्पष्ट प्राथमिकताएं, संकेतक और मापनीय परिणाम तय करना है.

इसी दिशा में आयोग ‘विकसित उत्तराखंड-2047’ के लिए संकेतक ढांचा तैयार कर रहा है. इसके जरिए आने वाले वर्षों में यह आकलन किया जा सकेगा कि सरकार की नीतियों और योजनाओं से राज्य तय लक्ष्यों की दिशा में कितना आगे बढ़ रहा है.

सेतु आयोग की भूमिका

सेतु आयोग को सामान्य सरकारी विभाग की तरह किसी योजना को सीधे लागू करने वाली संस्था के रूप में नहीं देखा जाता. इसका प्रमुख कार्य सरकार को नीति अनुसंधान, विश्लेषण, रणनीतिक सुझाव और विकास संबंधी परामर्श उपलब्ध कराना है.

केंद्र की राज्य सहायता मिशन की अवधारणा में भी राज्यों की अपने संस्थान को मजबूत करने, निगरानी और मूल्यांकन, डेटा विश्लेषण में सुधार तथा विकास के प्रमुख स्रोतों की पहचान पर जोर दिया गया है. उत्तराखंड इसी व्यवस्था के तहत सेतु को अपनी राज्य स्तरीय संस्था के रूप में इस्तेमाल कर रहा है.

आयोग किसी विषय पर पहले समस्या और उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन करता है. इसके बाद संबंधित विभागों, विश्वविद्यालयों, विशेषज्ञ संस्थानों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा अन्य हितधारकों से इनपुट लेकर नीति विकल्प और सुधार के सुझाव तैयार किए जाते हैं.

इसके बाद योजनाओं और नीतियों के कार्यान्वयन का मूल्यांकन भी किया जाता है, ताकि सरकारी हस्तक्षेप के वास्तविक असर का पता चल सके. आयोग विशेष इनपुट और साक्ष्य-आधारित नीति विकल्प उपलब्ध कराने के साथ विभिन्न नीतियों और योजनाओं की निगरानी एवं मूल्यांकन के लिए फ्रेमवर्क विकसित करने, खोज और नवाचार को बढ़ावा देने तथा टेक्नोलॉजी को पॉलिसी और इम्प्लीमेंटेशन से जोड़ने की भूमिका निभाता है.

-मनोज कुमार पंत, निदेशक, सेतु आयोग उत्तराखंड-

विशेषज्ञों की टीम

सेतु आयोग में मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, निदेशक स्तर के अधिकारी, डोमेन लीड्स, सलाहकार और विभिन्न तकनीकी एवं शोध विशेषज्ञ शामिल हैं. अलग-अलग विषयों के लिए विशेषज्ञता आधारित टीमें काम करती हैं.

मौजूदा व्यवस्था में आयोग के सीईओ के तौर पर शत्रुघ्न सिंह और डायरेक्टर के तौर पर डॉ. मनोज कुमार पंत समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अधिकारी और सलाहकार काम कर रहे हैं. आयोग विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, सरकारी विभागों और विशेषज्ञ संगठनों को भी प्रक्रिया में शामिल करता है.

पांच क्षेत्रों में काम

वर्तमान में आयोग का काम पांच प्रमुख क्षेत्रों में चल रहा है. अर्थव्यवस्था और कौशल विकास के तहत बायो एनर्जी नीति, वन पंचायत नियमावली और सहकारिता नीति के प्रारूप, भविष्य के कौशल, डिजिटल एवं रोजगार योग्यता कौशल, किसानों की बाजार पहुंच और विदेशी प्लेसमेंट सेल जैसे विषयों पर काम किया जा रहा है.

अवसंरचना और कल्याण के क्षेत्र में एकीकृत स्मार्ट ग्राम केंद्र, जेईई उत्कृष्टता केंद्र, हॉस्पिटैलिटी स्किल सेंटर, एनीमिया और मातृ-शिशु स्वास्थ्य से जुड़े हस्तक्षेप तथा एम्स ऋषिकेश के सहयोग से ट्रॉमा केयर और टेलीमेडिसिन को मजबूत करने की पहल शामिल है.

शहरी विकास के तहत नगरीय निकायों को अधिकारों के हस्तांतरण, ठोस कचरा प्रबंधन और नए शहरी कानून की जरूरत का अध्ययन किया जा रहा है. वहीं निगरानी और मूल्यांकन के तहत मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना, अमृत सरोवर, सीमांत क्षेत्र विकास और मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना जैसी योजनाओं का मूल्यांकन किया जा रहा है.

पांचवां क्षेत्र डाटा विश्लेषण और सामग्री संचालन है. राज्य डेटा गवर्नेंस नीति के जरिए सरकारी सेवाओं और योजनाओं को अधिक डेटा आधारित बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

-दिनेश अग्रवाल, सलाहकार सेतु आयोग-

पर्वतीय गांवों पर जोर

दिनेश अग्रवाल ने कहा कि विकसित उत्तराखंड का वास्तविक आधार पर्वतीय गांव होने चाहिए. प्रत्येक पर्वतीय गांव तक बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा की मजबूत व्यवस्था पहुंचाना जरूरी है.

उन्होंने कहा कि जब गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होंगी, तभी पलायन रोकने, स्थानीय आजीविका मजबूत करने और गांवों को टिकाऊ बनाने की दिशा में वास्तविक परिणाम हासिल किए जा सकेंगे.

सेतु आयोग का मूल उद्देश्य नीति निर्माण को आंकड़ों, शोध और जमीनी वास्तविकताओं से जोड़ना है. विकसित उत्तराखंड-2047 का विजन तैयार करते समय अलग-अलग क्षेत्रों की संभावनाओं, चुनौतियों और भविष्य की जरूरतों का व्यापक अध्ययन किया जा रहा है, ताकि विजन डॉक्यूमेंट केवल लक्ष्य तय करने वाला दस्तावेज न रहकर परिणाम आधारित विकास का रोडमैप बने.

सितंबर में सरकार के सामने आने वाला विजन डॉक्यूमेंट इस पूरी कवायद का महत्वपूर्ण परिणाम माना जा रहा है. इसके जरिए 2047 तक उत्तराखंड को किस दिशा में ले जाना है, किन क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी है और विकास की प्रगति को किस तरह मापा जाएगा, इसका व्यापक रोडमैप सामने आने की उम्मीद है.

सरकार के लिए इसके बाद सिफारिशों को विभागीय योजनाओं, बजट और जमीन पर होने वाले काम में बदलना चुनौती होगी.