अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। इसी मौके पर डोंगरगढ़ के इतिहास से जुड़ी 70 साल पुरानी एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो बताती है कि अपने शहर के हक और पहचान के लिए यहां के लोगों ने किस तरह एकजुट होकर संघर्ष किया था।

यह कहानी है साल 1956 की, जब मध्यप्रदेश के गठन के समय डोंगरगढ़ की तहसील से जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए थे। स्थानीय लोगों की स्मृतियों के मुताबिक, उस समय डोंगरगढ़ की तहसील से जुड़ी सुविधाएं खैरागढ़ स्थानांतरित किए जाने की चर्चा सामने आई थी। इस खबर ने लोगों को बेचैन कर दिया। उन्हें लगा कि अगर ऐसा हुआ तो डोंगरगढ़ की प्रशासनिक पहचान और आम लोगों की सुविधाएं प्रभावित होंगी।

फिर क्या था, शहर के लोग अपनी मांग को लेकर एकजुट हो गए। 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य का गठन हुआ था। इसी दौर में डोंगरगढ़ के लोगों ने अपनी तहसील से जुड़ी व्यवस्था को बचाने के लिए ‘तहसील बचाओ संघर्ष समिति’ बनाई। इस समिति के अध्यक्ष अधिवक्ता बसंत काले और सचिव महंत मगनदास थे। आंदोलन में सेठ केदारनाथ अग्रवाल, बस्ता भाई टैंक और राधाकिशन अग्रवाल भगत सहित शहर के कई प्रमुख लोग शामिल हुए।
यह केवल कुछ लोगों का विरोध नहीं था, बल्कि अपने शहर की प्रशासनिक पहचान और सुविधाओं को बचाने के लिए लोगों की सामूहिक आवाज थी। मांग को लेकर आंदोलन तेज हुआ। शहर में रैलियां निकाली गईं, धरना दिया गया और भूख हड़ताल शुरू हुई। महंत मगनदास, केदारनाथ अग्रवाल और राधाकिशन भगत ने अनशन किया। आंदोलन से जुड़े विवरणों में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठने का उल्लेख मिलता है।
अधिवक्ता बसंत काले आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे और कानूनी पहलुओं पर मार्गदर्शन दे रहे थे। धीरे-धीरे यह आंदोलन स्थानीय स्तर से आगे बढ़कर बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों तक पहुंच गया। बताया जाता है कि डोंगरगढ़ के लोगों की यह आवाज तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक भी पहुंची। इसके बाद उन्होंने इस मामले में मध्यस्थता के लिए मनोहर भाई पटेल को जिम्मेदारी दी।
मनोहर भाई पटेल ने आंदोलनकारियों और संबंधित पक्षों के बीच बातचीत का रास्ता निकाला। इस दौरान तीन दौर की बैठकें हुईं। बातचीत के बाद ऐसा रास्ता निकला, जिसमें डोंगरगढ़ की मौजूदा तहसील से जुड़ी सुविधाएं बनाए रखने और प्रशासनिक व्यवस्था को जारी रखने पर सहमति बनी। डोंगरगढ़ को खैरागढ़ तहसील के अधीन उपतहसील के रूप में रखने और यहां अतिरिक्त तहसीलदार की पदस्थापना की व्यवस्था तय होने की बात सामने आती है। इसी सहमति के बाद आंदोलन समाप्त हुआ। आंदोलनकारियों का अनशन मनोहर भाई पटेल ने नींबू पानी पिलाकर समाप्त कराया था।
इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी डोंगरगढ़ निवासी और सेवानिवृत्त वरिष्ठ शिक्षक ललित किशोर नारंग ने साझा की है। नारंग लंबे समय तक डोंगरगढ़ में शिक्षक रहे हैं। वे प्रधानाचार्य के साथ डोंगरगढ़ ब्लॉक शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। खास बात यह है कि वे उस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे महंत मगनदास के नाती हैं। यानी यह कहानी उनके लिए केवल इतिहास का एक प्रसंग नहीं, बल्कि परिवार से जुड़ी ऐसी स्मृति है, जिसे उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना और सहेजकर रखा है।
इस कहानी के साथ सामने आई एक पुरानी तस्वीर ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। तस्वीर में उस दौर के आंदोलन से जुड़े लोगों के नाम दर्ज हैं। पहली पंक्ति में कुर्सियों पर बैठे लोगों में डॉ. शिवदेव सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, सेठ भागचंद, जोध सिंह और बसंत काले के नाम हैं। दूसरी पंक्ति में मुसद्दी लाल, रामजी मेनारिया, डॉ. पी.बी. दास, रामसिंह, रामानंद गट्टानी, मगनदास, राधाकिशन भगत और राधाकिशन अग्रवाल के नाम दर्ज हैं। वहीं पीछे की पंक्ति में हरि प्रसाद अग्रवाल, तफज्जुल हुसैन साहब और ग्यारसी लाल अग्रवाल के नाम लिखे हैं।
तस्वीर में दर्ज ये नाम उस दौर के उन लोगों की याद दिलाते हैं, जिन्होंने डोंगरगढ़ के हित से जुड़े सवाल पर एक साथ खड़े होने का फैसला किया था। सत्तर साल पहले डोंगरगढ़ के लोगों ने अपनी तहसील और प्रशासनिक पहचान को बचाए रखने के लिए जो आवाज उठाई थी, उसकी याद अब एक पुरानी तस्वीर के जरिए फिर ताजा हो गई है।
पीढ़ियां बदल गईं, दौर बदल गया, लेकिन अपने शहर के हक के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने वाले उन लोगों की कहानी आज भी डोंगरगढ़ के इतिहास का अहम हिस्सा है। छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस पर सामने आई यह तस्वीर याद दिलाती है कि किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों और सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके लिए खड़े होने वाले लोगों के संघर्ष से भी बनती है।
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