रायपुर। शारीरिक शिक्षा में पीएचडी, तैराकी में राष्ट्रीय स्तर का अनुभव, दो दशक तक क्रीड़ा अधिकारी की जिम्मेदारी और अब जंगलों को समझने-समझाने का अभियान… डॉ. बाजपेयी की कहानी खेल, शिक्षा, सेवा और प्रकृति प्रेम का अनूठा संगम है.

कुछ लोग अपनी नौकरी को केवल जिम्मेदारी मानकर निभाते हैं, जबकि कुछ लोग अपने काम को समाज के लिए एक मिशन बना देते हैं. डॉ. बाजपेयी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने खेल और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने के बाद प्रकृति संरक्षण को अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बना लिया.

बिलासपुर के एक संस्कारी और प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे डॉ. बाजपेयी ने शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हासिल की. गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर से शारीरिक शिक्षा विषय में प्रथम पीएचडी प्राप्त करने वाले डॉ. बाजपेयी ने तैराकी में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व किया. खेल के प्रति उनकी इसी प्रतिबद्धता ने उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण के पश्चिम क्षेत्र, गांधीनगर से NIS प्रमाणपत्र हासिल करने तक पहुंचाया.

लगभग दो दशक तक आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग, छत्तीसगढ़ में क्रीड़ा अधिकारी के रूप में उन्होंने खेल गतिविधियों को नई दिशा देने का काम किया. लेकिन डॉ. बाजपेयी की पहचान केवल एक खेल अधिकारी तक सीमित नहीं रही. खेल मैदान से निकलकर उनका जुड़ाव धीरे-धीरे जंगल और प्रकृति से गहराता गया.

जंगल को सिर्फ देखना नहीं, समझना जरूरी है

डॉ. बाजपेयी मानते हैं कि जंगलों के संरक्षण के लिए केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है. जरूरी है कि लोग जंगल को समझें, उसके भीतर मौजूद जीवन को महसूस करें और प्रकृति के साथ अपना रिश्ता विकसित करें. इसी सोच ने उन्हें सैकड़ों जंगल ट्रैकिंग और प्रकृति अवलोकन कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रेरित किया.

युवाओं से लेकर अलग-अलग आयु वर्ग के प्रकृति प्रेमियों तक को वे 5 से लेकर 25 किलोमीटर तक की ट्रैकिंग कराते हैं. ट्रैकिंग महज पैदल चलने का कार्यक्रम नहीं होती. जंगल के बीच चलते हुए प्रतिभागियों को पेड़-पौधों, पक्षियों, वन्यजीवों, उनके व्यवहार और जीवनशैली के बारे में जानकारी दी जाती है.

जो व्यक्ति एक बार इन कार्यक्रमों में शामिल होता है, उसके लिए जंगल फिर केवल पेड़ों का समूह नहीं रह जाता. वह जंगल में जीवन को महसूस करने लगता है. पेड़-पौधों, पक्षियों और वन्यजीवों के प्रति उसका नजरिया बदलता है और प्रकृति संरक्षण की जरूरत उसके भीतर से पैदा होती है.

‘जंगल मितान’ बना प्रकृति प्रेमियों का कारवां

इसी उद्देश्य को व्यापक रूप देने के लिए डॉ. बाजपेयी ने प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक और संकल्पित लोगों को एक मंच पर जोड़ा और ‘जंगल मितान’ संस्था की शुरुआत की.

‘जंगल मितान’ के माध्यम से उन्होंने अपनी शासकीय व्यस्तताओं के बावजूद सैकड़ों कार्यक्रम आयोजित किए. इन कार्यक्रमों में राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, अधिवक्ताओं, डॉक्टरों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, व्यापारियों, युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ा गया.

इस अभियान का मुख्यालय अचानकमार टाइगर रिजर्व के मुख्य द्वार के समीप शिवतराई में है. यहीं से जंगल को करीब से जानने, समझने और लोगों को उससे जोड़ने के अनेक कार्यक्रम संचालित होते हैं. डॉ. बाजपेयी का मानना है कि प्रकृति संरक्षण तभी जनआंदोलन बन सकता है, जब समाज का हर वर्ग जंगल को अपना समझे. यही वजह है कि ‘जंगल मितान’ के कार्यक्रम किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं हैं.

खेल के मैदान से अंतरराष्ट्रीय मंच तक आदिवासी विद्यार्थियों की उड़ान

क्रीड़ा अधिकारी के रूप में डॉ. बाजपेयी का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है. अपने कार्यकाल में उन्होंने लगभग सवा सौ आदिवासी विद्यार्थियों को स्काउट-गाइड के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया. बांग्लादेश, थाईलैंड, फिलीपींस, इंग्लैंड, स्वीडन, नॉर्वे और जापान जैसे देशों में आयोजित विश्व स्काउट जम्बूरी, एशिया-पैसिफिक जम्बूरी और अन्य अंतरराष्ट्रीय जम्बूरियों में इन विद्यार्थियों ने प्रतिनिधित्व और सहभागिता की.

यह केवल विद्यार्थियों की विदेश यात्रा नहीं थी, बल्कि उन युवाओं के लिए दुनिया को देखने, अलग संस्कृतियों को समझने और आत्मविश्वास के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाने का अवसर था.

विश्वविद्यालय के खेल इतिहास में भी अहम योगदान

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. बाजपेयी ने खेल गतिविधियों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बिलासपुर में राष्ट्रीय अंतर विश्वविद्यालयीन फुटबॉल प्रतियोगिता के सफल आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने विश्वविद्यालय की पहली महिला क्रिकेट टीम तैयार की और उसे हैदराबाद में आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिनिधित्व कराया.

तैराकी के क्षेत्र में भी उनके मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय की टीम ने कानपुर, दिल्ली, रोहतक और त्रिचूर (केरल) में आयोजित अंतर विश्वविद्यालयीन इक्विटिक चैंपियनशिप में कई उपलब्धियां हासिल कीं. यानी जिस व्यक्ति ने स्वयं तैराकी के मैदान में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, उसी ने आगे चलकर युवाओं को खेल के मैदान से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का काम किया.

नौकरी से नौ साल पहले ही लिया प्रकृति के लिए नया संकल्प

शासकीय सेवा से अभी लगभग नौ वर्ष का कार्यकाल बाकी होने के बावजूद डॉ. बाजपेयी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुना है. उन्होंने शासन को आवेदन देकर 31 अक्टूबर 2026 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति देने का आग्रह किया है. यह निर्णय सामान्य अर्थों में किसी नौकरी से विदाई नहीं, बल्कि उनके जीवन के अगले अध्याय की शुरुआत है. अब वे अपना अधिक समय जंगल, प्रकृति और युवाओं को प्रकृति से जोड़ने के अभियान को देना चाहते हैं.

एक नई पारी… जंगल के नाम

डॉ. बाजपेयी की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उनके जीवन की तीन धाराएं—शिक्षा, खेल और प्रकृति—एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं. उन्होंने खेल को केवल प्रतियोगिता नहीं माना, बल्कि युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम बनाया. उन्होंने आदिवासी विद्यार्थियों को दुनिया देखने का अवसर दिया. उन्होंने विश्वविद्यालय के खेल ढांचे को मजबूत करने में योगदान दिया और अब वे जंगलों को समझने की संस्कृति विकसित करने में जुटे हैं.

उनका संदेश सरल है—जिस जंगल को हम समझेंगे, उसी जंगल से प्रेम करेंगे; और जिस जंगल से प्रेम करेंगे, उसकी रक्षा भी करेंगे. शायद यही वजह है कि डॉ. बाजपेयी के लिए ‘जंगल मितान’ केवल एक संस्था का नाम नहीं है. यह उस विचार का नाम है, जिसमें इंसान और प्रकृति के बीच खोते जा रहे रिश्ते को फिर से मजबूत करने का प्रयास है.

खेल के मैदान से जंगल की पगडंडियों तक डॉ. बाजपेयी की यह यात्रा बताती है कि सेवा की कोई एक सीमा नहीं होती. जिम्मेदारी बदल सकती है, पद बदल सकता है, लेकिन समाज और प्रकृति के लिए कुछ करने का संकल्प बना रहे तो व्यक्ति की असली पहचान उसके पद से नहीं, उसके कर्म से होती है.

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m