Automobile Desk – EV Auto Insurance vs Petrol-Diesel Cars : सड़कों पर दौड़ती शांत और चमचमाती इलेक्ट्रिक गाड़ियां हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं। कम रनिंग कॉस्ट और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण लोग अब तेजी से ईवी का रुख कर रहे हैं। हालांकि, जब बात नई कार खरीदने की आती है, तो अधिकतर लोग केवल एक्स-शोरूम कीमत और चार्जिंग के गणित पर ही ध्यान देते हैं। अक्सर गाड़ी के मालिकाना हक से जुड़ा एक बड़ा खर्च नजरअंदाज हो जाता है, और वह है हर साल भरा जाने वाला व्हीकल इंश्योरेंस।

पहली बार ईवी खरीदने वाले ग्राहकों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि पारंपरिक पेट्रोल और डीजल कारों की तुलना में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इंश्योरेंस प्रीमियम काफी ज्यादा होता है। थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की दरें तो सरकार द्वारा तय की जाती हैं, इसलिए वहां बड़ा अंतर नहीं दिखता। असली फर्क तब सामने आता है जब आप अपनी कार के लिए ओन-डैमेज या कॉम्प्रिहेंसिव कवर चुनते हैं।
इलेक्ट्रिक वाहनों के महंगे प्रीमियम के पीछे कई ठोस वजहें हैं:
- ज्यादा ऑन-रोड कीमत और हाई IDV
इलेक्ट्रिक गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाली एडवांस टेक्नोलॉजी, जटिल सर्किटरी और महंगी बैटरी की वजह से इनकी शुरुआती कीमत पेट्रोल-डीजल वेरिएंट्स से काफी ज्यादा होती है। इंश्योरेंस का गणित सीधा है; गाड़ी की वैल्यू यानी इंस्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू (IDV) जितनी ज्यादा होगी, उसका सालाना प्रीमियम भी उसी हिसाब से तय होगा। - कार की कीमत का आधा हिस्सा: बैटरी पैक
किसी भी ईवी का दिल उसकी लिथियम-आयन बैटरी होती है। यह कार के सबसे नाजुक और कीमती हिस्सों में से एक है, जिसकी कीमत गाड़ी की कुल लागत का 50 से 60 फीसदी तक हो सकती है। अगर किसी हादसे में या फिर जलभराव जैसी स्थिति में बैटरी पूरी तरह से खराब हो जाए, तो इसे बदलना जेब पर लाखों का बोझ डाल देता है। इसी बड़े रिस्क को कवर करने के लिए बीमा कंपनियां ईवी पर अतिरिक्त चार्ज वसूलती हैं। - महंगी रिपेयरिंग और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता
पारंपरिक गाड़ियों का मैकेनिज्म काफी आसान होता है और उनके पार्ट्स भी आसानी से बाजार में मिल जाते हैं। इसके उलट, ईवी में इस्तेमाल होने वाले हाई-वोल्टेज कंपोनेंट्स और सेंसर्स काफी महंगे होते हैं। कार कंपनियां इनके छोटे-छोटे कंपोनेंट्स अलग से बेचने के बजाय पूरा असेंबली सेट ही बदलती हैं। दुर्घटना के बाद रिपेयरिंग का बिल बड़ा बनने की वजह से बीमा कंपनियों का दावा खर्च भी बढ़ जाता है। - एक्सपर्ट्स और स्पेशल सर्विस सेंटर्स की कमी
पेट्रोल और डीजल गाड़ियों को ठीक करने वाले मैकेनिक हर गली-मोहल्ले में मिल जाते हैं, लेकिन ईवी की मरम्मत के लिए खास तौर पर ट्रेंड टेक्नीशियनों और एडवांस्ड टूल्स की जरूरत होती है। फिलहाल देश में सर्टिफाइड ईवी सर्विस सेंटर्स सीमित हैं। इस वजह से रिपेयरिंग में लगने वाला समय और लेबर कॉस्ट दोनों ही पेट्रोल कारों की तुलना में काफी ज्यादा बैठते हैं।
हालांकि, ऑटो एक्सपर्ट्स की मानें तो यह स्थिति हमेशा ऐसी नहीं रहेगी। आने वाले दिनों में जब देश के भीतर ही बैटरियों और पार्ट्स का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगेगा, तो रिपेयरिंग का खर्च घटेगा। सड़कों पर ईवी की बढ़ती संख्या से बीमा कंपनियों को भी बेहतर रिस्क असेसमेंट का डेटा मिलेगा, जिससे भविष्य में प्रीमियम की दरें संतुलित होने की पूरी उम्मीद है।

