Business Desk – Foreign Institutional Investors : भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की बिकवाली लगातार जारी है। अक्टूबर में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने बाजार से 34,843 करोड़ रुपए निकाल लिए। यह लगातार दूसरा महीना है, जब विदेशी निवेशकों ने बड़ी रकम निकाली है। 2026 में अब तक उनकी कुल बिकवाली 2.95 लाख करोड़ रुपए हो चुकी है।
इस साल सेंसेक्स करीब 13% यानी 10,729 अंक और निफ्टी 12% यानी 3,093 अंक गिर चुका है। हालांकि, अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में विदेशी निवेशकों ने 6,300 करोड़ रुपए की खरीदारी की। ऐसे में सवाल है कि क्या विदेशी निवेशकों की बिकवाली से ही बाजार में इतनी बड़ी गिरावट आई और क्या अब उनकी वापसी शुरू हो गई है?
सितंबर और अक्टूबर में लगातार निकाला पैसा
सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में विदेशी निवेशकों ने 35,861 करोड़ रुपए निकाले थे। अक्टूबर में भी 34,843 करोड़ रुपए की बिकवाली की।
इससे पहले जुलाई में 20,200 करोड़ और अगस्त में 29,631 करोड़ रुपए का निवेश आया था। लेकिन सितंबर से विदेशी निवेशकों का रुख बदल गया। अक्टूबर की बिकवाली के बाद 2026 में अब तक कुल निकासी 2.95 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई है।

क्या FPI की बिकवाली से गिरा शेयर बाजार?
विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली से बाजार पर दबाव बढ़ा है। जब विदेशी फंड बड़ी मात्रा में शेयर बेचते हैं, तो बाजार में गिरावट आ सकती है। इस साल सेंसेक्स और निफ्टी की कमजोरी के पीछे यह भी एक बड़ी वजह रही है।
हालांकि, बाजार में गिरावट के लिए सिर्फ विदेशी निवेशकों को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरें और कंपनियों के नतीजे भी बाजार की चाल पर असर डालते हैं।
आखिरी हफ्ते में विदेशी निवेशकों ने फिर की खरीदारी
अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में विदेशी निवेशकों का रुख बदला। 26 से 30 अक्टूबर के बीच उन्होंने 6,300 करोड़ रुपए का नेट निवेश किया। इससे पहले 23 अक्टूबर को खत्म हुए सप्ताह में करीब 2,700 करोड़ रुपए की बिकवाली की थी।
30 अक्टूबर को खत्म हुए आखिरी चार कारोबारी दिनों में से तीन दिन विदेशी निवेशक खरीदार रहे। उनकी खरीदारी से निफ्टी फिर 23,000 के पार पहुंच गया। हालांकि, एक हफ्ते की खरीदारी को बिकवाली का ट्रेंड खत्म होने का संकेत नहीं माना जा सकता।
DIIs ने बाजार को संभाला
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने बाजार को सहारा दिया। घरेलू म्यूचुअल फंड और दूसरे संस्थागत निवेशकों ने लगातार खरीदारी की। इससे विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर कम हुआ और बाजार को संभलने में मदद मिली।
कच्चे तेल और अमेरिकी ब्याज दरों से बढ़ी चिंता
विदेशी निवेशकों की बिकवाली की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से महंगाई और कंपनियों की लागत बढ़ने का खतरा रहता है।
इसके अलावा अमेरिका में बॉन्ड यील्ड ऊंची रहने से विदेशी निवेशकों को वहां बेहतर रिटर्न मिल रहा है। ऐसे में वे भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी बाजार में लगा रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी फेड के ब्याज दरें स्थिर रखने से निवेशकों को कुछ राहत मिली है।
दूसरी तरफ, भारतीय शेयरों की कीमतें गिरने से कई बड़े शेयर आकर्षक वैल्युएशन पर आ गए हैं। भारत की मजबूत आर्थिक ग्रोथ और चुनिंदा कंपनियों में बेहतर कमाई की उम्मीद से भी विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है। वहीं, ग्लोबल AI ट्रेड में सुस्ती ने भी उनके निवेश पर असर डाला है।
एक्सपर्ट्स की राय: आगे क्या होगा?
मीरा मनी के को-फाउंडर आनंद के. राठी के मुताबिक, अक्टूबर में विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक ब्याज दरें और कंपनियों के नतीजों को लेकर अनिश्चितता रही।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटजिस्ट वी. के. विजयकुमार का कहना है कि भारतीय शेयरों के आकर्षक वैल्युएशन और अमेरिकी फेड के फैसले से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।
वहीं, बजाज ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) पवित्र मुखर्जी के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की वापसी बाजार के लिए अच्छी है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें तेजी को सीमित कर सकती हैं।
आने वाले दिनों में अमेरिकी मिड-टर्म चुनाव, ब्रेंट क्रूड की कीमतें, अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन संघर्ष के साथ कंपनियों के तिमाही नतीजों पर बाजार की नजर रहेगी। विदेशी निवेशकों की खरीदारी लगातार जारी रहती है या नहीं, इससे बाजार की आगे की दिशा तय करने में मदद मिलेगी।
FPI क्या होता है?
फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) का मतलब विदेशी निवेशकों की ओर से किसी दूसरे देश के शेयर, म्यूचुअल फंड और बॉन्ड में पैसा लगाना है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में खरीदारी करते हैं, तो शेयरों की मांग बढ़ती है। इससे बाजार और रुपए को सहारा मिल सकता है।
इसके उलट, जब वे पैसा निकालते हैं तो शेयरों पर बिकवाली का दबाव बढ़ता है। इससे बाजार में गिरावट और रुपए में कमजोरी आ सकती है।

