गुजरात में इस साल मानसून के दौरान कम बारिश होने के कारण राज्य के कई हिस्सों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। जल संकट और सिंचाई की समस्याओं को देखते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने मानसून में अपर्याप्त वर्षा से प्रभावित चार प्रमुख जिलों—जामनगर, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर और कच्छ को आधिकारिक तौर पर सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। इस फैसले के साथ ही प्रभावित क्षेत्रों के किसानों और पशुपालकों के लिए सहायता योजनाओं का भी ऐलान किया गया है।

किसानों को मिलेगा प्रति हेक्टेयर 8,500 रुपये का मुआवजा

राज्य में इस मानसून सत्र में औसत वार्षिक बारिश का लगभग 89 प्रतिशत ही दर्ज किया गया है। हालांकि, जामनगर, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर और कच्छ जिलों में स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां बारिश का आंकड़ा काफी कम रहा। पानी की भारी किल्लत के कारण किसान अपनी फसलों की सिंचाई करने में असमर्थ रहे हैं, जिससे कृषि उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचा है।

किसानों की आर्थिक स्थिति को संबल देने के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता की घोषणा की है। इसके तहत प्रभावित जिलों के किसानों को उनकी क्षतिग्रस्त फसलों के मुआवजे के तौर पर 8,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। यह राहत राशि अधिकतम दो हेक्टेयर की भूमि सीमा तक ही मान्य होगी। सरकार का मानना है कि इस कदम से छोटे और सीमांत किसानों को तात्कालिक राहत मिलेगी और वे आगामी सत्र के लिए अपनी आजीविका को संभाल सकेंगे।

पशुपालकों के लिए चारे की निर्बाध आपूर्ति की योजना

फसलों के नुकसान के साथ-साथ कम बारिश का सीधा असर पशुधन और चारे की उपलब्धता पर भी पड़ा है। आने वाले महीनों में पशुओं के लिए हरे और सूखे चारे का संकट न खड़ा हो, इसके लिए सरकार ने अग्रिम रूप से व्यापक रणनीति तैयार की है। वर्तमान में भी सूखा प्रभावित इलाकों में रियायती और सब्सिडी वाली दरों पर पशुपालकों को चारा उपलब्ध कराया जा रहा है।

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में भी चारे की किल्लत न हो, इसके लिए आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाया जा रहा है और विशेष डिपो के जरिए चारे का वितरण सुनिश्चित किया जाएगा।

कम बारिश से पैदा हुए इस संकट से निपटने के लिए राज्य सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। जल आपूर्ति और सिंचाई विभाग को भी निर्देश दिए गए हैं कि उपलब्ध जल संसाधनों का विवेकपूर्ण और उचित प्रबंधन किया जाए ताकि ग्रामीणों और किसानों को न्यूनतम कठिनाई का सामना करना पड़े।

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