अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में 67 वर्षीय व्यक्ति को शादी के 37 साल बाद तलाक की मंजूरी दे दी है। अदालत ने पाया कि यह दंपत्ति पिछले 32 सालों (1992) से एक-दूसरे से पूरी तरह अलग रह रहा था। 1980 में विवाह के बंधन में बंधे इस जोड़े के दो बेटे हैं, लेकिन अगस्त 1992 में पत्नी अपने भाई के जन्मदिन समारोह में शामिल होने के लिए घर से निकली और उसके बाद कभी वापस नहीं लौटी।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वछानी की पीठ ने माना कि पति यह साबित करने में सफल रहा कि उसकी पत्नी ने बिना किसी वाजिब वजह के उनका त्याग (डेजर्शन) किया था। इतने लंबे समय तक अलग रहने के कारण उनके बीच वैवाहिक संबंध फिर से बहाल होने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।
मामले की पृष्ठभूमि
1989 में साथ रहने के दौरान दूसरे बच्चे के जन्म को लेकर इस जोड़े के बीच मतभेद शुरू हुए थे। पति का आरोप था कि छोटी-छोटी बातों पर विवाद होता था। 1992 में पत्नी के चले जाने के बाद पति ने 1999 में क्रूरता और परित्याग के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। हालांकि, 2015 में फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत का फैसला और शर्तें
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी के वकील ने स्वीकार किया कि दोनों 1992 से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक जीवन में लौटने की कोई संभावना नहीं है। सभी पहलुओं और दोनों पक्षों की उम्र को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 2015 के आदेश को रद्द कर दिया और तलाक की मंजूरी दी।
अदालत ने मानवीय आधार पर निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- स्थायी गुजारा भत्ता: पत्नी का कोई स्वतंत्र आय स्रोत न होने के कारण उनके मासिक गुजारा भत्ते को ₹12,000 से बढ़ाकर ₹20,000 प्रति माह कर दिया गया, जिसे पति सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर करेंगे।
- पेंशन लाभ: कोर्ट ने दर्ज किया कि पति इस बात पर सहमत हैं कि तलाक के बाद भी उनकी पत्नी ही उनके सर्विस रिकॉर्ड में एकमात्र नॉमिनी रहेंगी, जिससे उन्हें भविष्य में पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ मिलते रहेंगे।
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