अहमदाबाद। राज्य के एक प्रमुख विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितताओं और गंभीर प्रशासनिक गड़बड़ियों का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत मिले 16.50 करोड़ रुपये में से 14 करोड़ रुपये अपने खाते में जमा कर लिए थे। मामला उजागर होने के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया और डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से 14 करोड़ रुपये विश्वविद्यालय को वापस लौटा दिए। शेष 2.50 करोड़ रुपये को लेकर ऑडिट किया जा रहा है।

पुस्तकों की जबरन बिक्री और अन्य गंभीर आरोप

जांच के दायरे में आए मामलों में यह बात भी सामने आई है कि पूर्व कुलपति ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में अपनी लिखी पुस्तक ‘समग्र भारतीय अनुसंधान पद्धति’ की एक हजार प्रतियां विश्वविद्यालय को बिकवाई थीं। इसके लिए प्रकाशन संस्थान को विश्वविद्यालय कोष से भुगतान कराया गया। इसके अलावा, कार्यकारी परिषद या सिंडिकेट को विश्वास में लिए बिना करोड़ों रुपये के कार्य निजी कंपनियों को सौंपने, अपने लिए अतिरिक्त पद सृजित कर हर महीने भारी रकम लेने, महंगे पैकेज पर नियुक्तियां करने और सरकारी खर्च पर विदेश यात्रा के दौरान सौंदर्य प्रसाधन खरीदने के आरोप भी लगाए गए हैं।

सेवानिवृत्त न्यायाधीश कर रहे हैं जांच

विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन सभी वित्तीय लेनदेन, प्रशासनिक फैसलों और अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच गुजरात उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सौंप दी है। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिपोर्ट के आधार पर आगामी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई तय की जाएगी।

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