कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। ग्वालियर में एक तरफ जहां पुलिस ने फुर्ती दिखाते हुए अपहृत ढाई महीने की मासूम को चंद घंटों में बरामद कर लिया, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक संवेदनहीनता और कागजी औपचारिकताओं ने एक बेबस मजदूर मां के आंसुओं का सैलाब ला दिया है। किडनैपर से तो मासूम सुरक्षित छूट गई, लेकिन अब अपनी ही बेटी को गले लगाने के लिए मां को सरकारी दफ्तरों की चौखट पर गिड़गिड़ाना पड़ रहा है। ‘पहचान पत्र और जरूरी दस्तावेज’ न होने के चलते बाल संरक्षण गृह ने बच्ची को मां के सुपुर्द करने से मना कर दिया है। मंगलवार को बेबस मां ग्वालियर एसपी कार्यालय की जनसुनवाई में पहुंची और अधिकारियों के सामने फूट-फूटकर रोते हुए अपनी बच्ची वापस दिलाने की गुहार लगाई।
बस स्टैंड से चोरी हुई थी बच्ची, पुलिस ने चंद घंटों में ढूंढ निकाला
घटनाक्रम के मुताबिक, रविवार देर रात ग्वालियर के मुख्य बस स्टैंड से ढाई महीने की दूधमुंही बच्ची अचानक गायब हो गई थी। बच्ची के गायब होते ही हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल शहर के दर्जनों सीसीटीवी कैमरे खंगाले। पुलिस की सतर्कता रंग लाई और कुछ ही घंटों के भीतर न केवल मासूम बच्ची को सकुशल बरामद कर लिया गया, बल्कि अपहरणकर्ता को भी धर दबोचा गया।
कागजों की दीवार: बच्ची बाल गृह में, मां बाहर रोने को मजबूर
पुलिस की यह कामयाबी उस वक्त व्यवस्था की बेरुखी में बदल गई, जब बच्ची को मां के हाथ में सौंपने के बजाय सुरक्षा का हवाला देकर ‘मातृ छाया चाइल्ड केयर सेंटर’ भेज दिया गया। बच्ची की मां राधा मूल रूप से टीकमगढ़ की रहने वाली है और ग्वालियर में रहकर मजदूरी कर किसी तरह अपना पेट पालती है। गरीबी और लाचारी का आलम यह है कि उसके पास न तो कोई पहचान पत्र है और न ही जन्म से जुड़े दस्तावेज। जब वह अपनी जिगर के टुकड़े को लेने मातृ छाया पहुंची, तो प्रबंधन ने स्पष्ट कह दिया कि बिना दस्तावेजी प्रमाण और पहचान सत्यापन के बच्ची उसे नहीं सौंपी जा सकती।
जनसुनवाई में छलका दर्द, सीएसपी ने दी सफाई
मंगलवार को एसपी कार्यालय की जनसुनवाई में जब राधा पहुंची, तो उसका विलाप सुनकर वहां मौजूद हर शख्स सहम गया। अपनी पीड़ा बयां करते हुए उसने कहा कि वह मजदूर है, कागजात जुटाने के संसाधन उसके पास नहीं हैं, लेकिन बच्ची उसी की है।
मामले पर सीएसपी रोबिन जैन का कहना है कि जब बच्ची का अपहरण हुआ, उस वक्त मां मौके पर उपस्थित नहीं थी। इसलिए कानूनी और सुरक्षा मानकों के तहत बच्ची को बाल गृह में सुरक्षित रखा गया है। बाल संरक्षण कानूनों के तहत बच्चे की सुपुर्दगी से पहले अभिभावक की पहचान और दस्तावेजों की जांच अनिवार्य होती है। चूंकि महिला टीकमगढ़ की रहने वाली है, इसलिए पुलिस की टीमें उसके गृह जिले से संपर्क कर दस्तावेज और परिजनों का सत्यापन कराने में जुटी हैं।
मानवीय पहलू पर खड़े होते गंभीर सवाल
पुलिस अधिकारियों ने भरोसा दिया है कि औपचारिकताएं पूरी होते ही बच्ची मां को सौंप दी जाएगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने व्यवस्था के मानवीय पक्ष पर गहरा सवालिया निशान लगा दिया है। जब पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया, अपराध साबित हो गया, तो अपनी ही दूधमुंही बच्ची को पाने के लिए एक गरीब मां को इतनी जद्दोजहद क्यों करनी पड़ रही है? क्या संवेदनशील मामलों में सरकारी मशीनरी का यह दायित्व नहीं बनता कि कागजी प्रक्रिया के फेर में उलझाने के बजाय मौके पर ही मानवीय आधार पर त्वरित जांच कर मां-बेटी का मिलन कराया जाए?
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