कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। दीपावली के पावन पर्व पर घर-घर में मां लक्ष्मी के स्वागत की भव्य तैयारियां होती हैं। इस दौरान घर की साफ-सफाई के लिए विशेष रूप से नई झाड़ू खरीदी जाती है और उसकी पूजा भी की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस झाड़ू को आप अपने घर में इस्तेमाल करते हैं, वही मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल के एक पूरे गांव की रोजी-रोटी और आत्मनिर्भरता का मुख्य आधार है? हम बात कर रहे हैं ग्वालियर के पास स्थित ‘सुसेरा’ गांव की, जहां हर घर में झाड़ू बनाने का काम होता है। यहां बच्चे, महिलाएं, युवा और बुजुर्गं हर कोई इस पुश्तैनी काम में जुटा रहता है और सबसे खास बात यह है कि रोजगार के लिए यहां के किसी भी युवा को शहर की ओर पलायन नहीं करना पड़ता।

घर ही है फैक्ट्री और परिवार है प्रशिक्षण केंद्र
सुसेरा गांव में सुबह की शुरुआत घर के चूल्हों के साथ-साथ झाड़ू बनाने के काम से शुरू हो जाती है। किसी के हाथ में खजूर की पत्तियां हैं, कोई तीलियां छांट रहा है, तो कोई उन्हें बांधकर झाड़ू को अंतिम आकार देने में जुटा है। करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव के 150 घरों में रहने वाले लगभग एक हजार परिवारजन सीधे तौर पर झाड़ू निर्माण से जुड़े हैं। यहां कोई भी बेरोजगार नहीं है। यह काम यहां सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक अनमोल विरासत है। कई परिवार ऐसे हैं, जहां चार से सात पीढ़ियों से लगातार झाड़ू बनाने का काम किया जा रहा है। यहाँ काम सीखने के लिए किसी बड़े संस्थान की जरूरत नहीं होती; घर ही इनकी फैक्ट्री है और परिवार इनका अपना प्रशिक्षण केंद्र है, जहां बुजुर्ग अपनी पीढ़ियों का अनुभव नई पीढ़ी को सौंपते हैं।

चार से सात पीढ़ियों से जारी है परंपरा
सुसेरा में झाड़ू बनाना सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है। कई परिवार ऐसे हैं, जहां चार से सात पीढ़ियों से लगातार झाड़ू बनाने का काम हो रहा है। यहां किसी को काम सीखने के लिए बड़े संस्थान में जाने की जरूरत नहीं। घर ही इनकी फैक्ट्री है और परिवार ही इनका प्रशिक्षण केंद्र। यही वजह है कि दूसरे गांवों और इलाकों से भी लोग यहां झाड़ू बनाने का हुनर सीखने आते हैं। गांव के करीब 450 युवा, 500 महिलाएं और 350 बुजुर्ग इस काम से जुड़े बताए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश से आता है कच्चा माल
सुसेरा की पहचान अब सिर्फ झाड़ू बनाने वाले गांव के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में भी बन चुकी है। यहां साल भर काम चलता है। कच्चा माल उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के रानीपुर से लाया जाता है। साल भर में 400 से ज्यादा ट्रक कच्चा माल गांव पहुंचता है, जबकि तैयार झाड़ुओं की सप्लाई के लिए करीब एक हजार ट्रक माल बाहर जाता है। एक ट्रक में लगभग 150 बोरे होते हैं और एक बोरे में करीब 200 झाड़ू पैक की जाती हैं। यानी एक ट्रक में करीब 30 हजार झाड़ू। सामान्य दिनों में एक बोरे की कीमत 2500 से 3000 रुपये तक रहती है, जबकि दीपावली के सीजन में यही कीमत बढ़कर 4 से 5 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। इस तरह गांव साल भर में करोड़ों रुपये का कारोबार करता है।

एमपी से लेकर यूपी और राजस्थान तक है भारी मांग
सुसेरा में बनने वाली झाड़ू की मांग मध्य प्रदेश के साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी है। ग्वालियर, भिंड, श्योपुर और सबलगढ़ सहित पूरे अंचल में इसकी सप्लाई होती है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, इटावा, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद और मथुरा तक झाड़ू पहुंचती है। वहीं राजस्थान के बाड़ी, सरमथुरा और करौली में भी इसकी बड़ी मांग है। दीपावली के त्योहार पर ऑर्डर बढ़ने के साथ गांव के कारीगरों के हाथों की रफ्तार भी बढ़ जाती है।

रोजाना होती है 1200 रुपये तक की कमाई
एक झाड़ू तैयार करने के पीछे भी काफी मेहनत और हुनर लगता है। सबसे पहले कारीगर खजूर की पत्तियों को खुद काटकर लाते हैं। एक गाड़ी में करीब 500 बंडल तक लाए जाते हैं। एक बंडल से लगभग 30 झाड़ू तैयार होती हैं। कच्चे माल की कीमत 100 से 120 रुपये प्रति बंडल तक पड़ती है। इसके बाद पत्तियों को छांटने, साफ करने, सही आकार में काटने और बांधने का काम होता है। एक झाड़ू तैयार करने में करीब 20 रुपये की लागत बताई गई है। पूरी प्रक्रिया में परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। एक व्यक्ति की रोजाना कमाई करीब एक हजार से 1200 रुपये तक बताई जाती है।

झाड़ू को लेकर है दीपावली पर विशेष मान्यता
जिस झाड़ू को सुसेरा के लोग दिन-रात मेहनत से तैयार करते हैं, दीपावली पर उसी झाड़ू का विशेष धार्मिक महत्व भी है। मान्यता है कि झाड़ू मां लक्ष्मी का प्रतीक है। जिस घर में स्वच्छता होती है, वहां मां लक्ष्मी का वास होता है। धनतेरस और दीपावली पर नई झाड़ू खरीदने और उसका पूजन करने की परंपरा भी इसी विश्वास से जुड़ी है। ऐसे में सुसेरा के इन कारीगरों की मेहनत हजारों घरों तक सिर्फ स्वच्छता का साधन ही नहीं पहुंचाती, बल्कि दीपावली की एक खास परंपरा का हिस्सा भी बनती है।

हुनर को बना लिया है ताकत
एक तरफ देश के कई गांवों से रोजगार की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं, वहीं सुसेरा ने अपने हुनर को ही अपनी ताकत बना लिया है। यहां न नौकरी के लिए शहर जाने की मजबूरी है और न ही रोजगार के लिए किसी दूसरे का मुंह देखने की जरूरत। घर ही कारखाना है, परिवार ही कामगार है और पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर ही इनकी पूंजी है। सुसेरा की यह कहानी बताती है कि अगर परंपरागत हुनर को बाजार मिले, तो एक पूरा गांव अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है।
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