हरियाणा ने शिशु मृत्यु दर को घटाकर 24 पर पहुँचाया है, जो राष्ट्रीय औसत के बराबर है। हालांकि, पंजाब अभी भी 16 के स्कोर के साथ हरियाणा से काफी बेहतर स्थिति में है।

कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा सरकार शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में सुधार को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश के सबसे विकसित और आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों में गिने जाने वाले हरियाणा के लिए सिर्फ राष्ट्रीय औसत तक पहुंचना ही संतोष की बात है? सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) रिपोर्ट 2024 के अनुसार, हरियाणा में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर शिशु मृत्यु दर घटकर 24 रह गई है। सरकार इसे उपलब्धि मान रही है, क्योंकि राज्य अब राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुंच गया है। लेकिन पड़ोसी पंजाब, जिसकी शिशु मृत्यु दर 16 है, हरियाणा से अब भी काफी आगे दिखाई देता है।

हरियाणा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा ने दावा किया है कि पिछले पांच वर्षों में हरियाणा ने शिशु मृत्यु दर में लगभग 14 प्रतिशत सुधार किया है। राज्य में यह दर 28 से घटकर 24 हुई है, जबकि पंजाब में 18 से घटकर 16 हुई, जो लगभग 11 प्रतिशत सुधार है। सरकार तेज सुधार की गति को अपनी उपलब्धि बता रही है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि जब शुरुआती स्थिति ही पंजाब से कमजोर थी, तो क्या प्रतिशत सुधार की बजाय अंतिम परिणामों पर ज्यादा फोकस नहीं होना चाहिए?

हरियाणा लंबे समय से औद्योगिक विकास, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य ढांचे और निवेश के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य संकेतकों, खासकर शिशु मृत्यु दर जैसे संवेदनशील पैमानों पर सिर्फ राष्ट्रीय औसत तक पहुंचना बहस का विषय बन सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि विकसित राज्यों का लक्ष्य राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि देश के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वाले राज्यों की बराबरी होना चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग इस सुधार का श्रेय एसएनसीयू (Special Newborn Care Unit – विशेष नवजात देखभाल इकाई), एनबीएसयू (Newborn Stabilization Unit – नवजात स्थिरीकरण इकाई), एनआरसी (Nutrition Rehabilitation Center – पोषण पुनर्वास केंद्र), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, कंगारू मदर केयर और नवजात गहन चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार को दे रहा है। सरकार का दावा है कि आने वाले समय में और नवजात देखभाल इकाइयां स्थापित की जाएंगी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत किया जाएगा।

हालांकि आंकड़े सुधार जरूर दिखा रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल कायम है-क्या हरियाणा जैसे विकसित राज्य के लिए सिर्फ राष्ट्रीय औसत तक पहुंचना जश्न का विषय है, या फिर लक्ष्य पंजाब जैसे बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों को पीछे छोड़ने का होना चाहिए? फिलहाल, सुधार की रफ्तार पर सरकार खुश जरूर है, लेकिन नतीजों की तुलना अब भी कई सवाल खड़े कर रही है।