हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना को लेकर कानूनी और तकनीकी पेंच कसते चले आ रहे हैं। शहर के LIG चौराहा से नवलखा चौराहा तक प्रस्तावित इस महत्वपूर्ण एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सवा घंटे से अधिक समय तक अंतिम बहस चली। शासन की ओर से कोर्ट में परियोजना का वीडियो प्रेजेंटेशन पेश किया गया, वहीं याचिकाकर्ता ने प्रोजेक्ट की उपयोगिता, भारी लागत और तकनीकी खामियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।

याचिकाकर्ता के प्रमुख तर्क और आपत्तियां

याचिकाकर्ता अतुल शेठ की ओर से पैरवी करते हुए कोर्ट के सामने कई बड़े बिंदु रखे गए। वीडियो प्रेजेंटेशन पर सवाल: याचिकाकर्ता का दावा है कि सिर्फ एक वीडियो प्रेजेंटेशन के आधार पर इस भारी-भरकम परियोजना की जमीनी उपयोगिता साबित नहीं की जा सकती। लागत में भारी बढ़ोतरी का अंदेशा: लगभग 350 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले इस प्रोजेक्ट को लेकर आशंका जताई गई है कि डिजाइन में बदलाव और अन्य खर्चों के चलते इसकी लागत बढ़कर सीधे 700 से 750 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

ट्रैफिक और तकनीकी अध्ययन की मांग

GAD पर PWD चीफ इंजीनियर के हस्ताक्षर, एक्रोपोलिस की ट्रैफिक सर्वे रिपोर्ट और SGSITS की आपत्तियों का मुद्दा भी उठाया गया। याचिकाकर्ता ने पूरे प्रोजेक्ट का स्वतंत्र और विस्तृत तकनीकी अध्ययन कराने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाने की मांग की है। कम उपयोगिता का दावा: याचिकाकर्ता का तर्क है कि शहर में ट्रैफिक की मूल समस्या सड़कों की लेन से ज्यादा चौराहों की क्रॉसिंग से जुड़ी है। अध्ययन के आधार पर इस कॉरिडोर की उपयोगिता 10 प्रतिशत से भी कम बताई गई, जबकि इसके मुकाबले अलग-अलग प्रमुख चौराहों पर फ्लाईओवर बनाने की संयुक्त उपयोगिता 42 प्रतिशत से अधिक होने का दावा किया गया।

हाईकोर्ट का अगला कदम

शासन पक्ष की दलीलें सुनने और याचिकाकर्ता के तमाम तकनीकी, ट्रैफिक, लागत और उपयोगिता से जुड़े बिंदु देखने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से तर्कों का एक संक्षिप्त सिनॉप्सिस (संक्षिप्त विवरण) मांगा है। अब इस मामले में तकनीकी और कानूनी पहलुओं से जुड़े बिंदुओं का सिनॉप्सिस कोर्ट में पेश किया जाएगा, जिसके बाद आगे की सुनवाई और फैसले का रास्ता साफ होगा।

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