सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल (Sanjay Kishan Kaul) ने उमर खालिद (Umar Khalid) और शरजील इमाम (Sharjeel ) की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के मामले में लंबी न्यायिक प्रक्रिया पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि देश में दोष सिद्ध होने या बरी होने से पहले का समय ही एक सजा बन गया है। उनके अनुसार, मुकदमे की सुनवाई में अत्यधिक देरी होने से आरोपों का सामना कर रहे लोगों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है। पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने कहा कि जब किसी मामले में अंतिम फैसला आने में लंबा समय लगता है, तो मुकदमे के नतीजे से पहले बिताई गई अवधि भी व्यक्ति के लिए सजा जैसी हो जाती है। उन्होंने ऐसे मामलों में जमानत दिए जाने को सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

‘ज्यादातर मामलों में जमानत सामान्य बात होनी चाहिए’

पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने कहा कि ज्यादातर मामलों में जमानत मिलना एक सामान्य बात होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कुछ कानूनों में ऐसे प्रावधान हैं, जो जमानत देने की प्रक्रिया को कठिन बनाते हैं। उनकी टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन के सवाल को सामने लाती है। जमानत का उद्देश्य मुकदमे की सुनवाई के दौरान व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक प्रतिबंध से बचाना है, जबकि अदालतों को मामले की प्रकृति और लागू कानूनों को भी ध्यान में रखना होता है।

जमानत के मुद्दे पर जस्टिस सुंदरेश के साथ की थी चर्चा

पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने बताया कि उन्होंने जस्टिस सुंदरेश के साथ मिलकर जमानत के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की थी। इस दौरान यह समझने का प्रयास किया गया कि आखिर लोग हिरासत में क्यों हैं और जमानत से जुड़े नियमों को किस तरह स्पष्ट किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संबंधित मामले में फैसला जस्टिस सुंदरेश ने लिखा था। कौल के अनुसार, जस्टिस सुंदरेश इस विषय पर काफी उदार दृष्टिकोण रखने वाले न्यायाधीश हैं।

पहले से मौजूद नियमों को स्पष्ट करने की कोशिश

संजय किशन कौल ने कहा कि चर्चा के दौरान कुछ ऐसे सिद्धांतों और नियमों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया, जो पहले से ही मौजूद थे। इसका उद्देश्य जमानत से जुड़े कानूनी मानकों को अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाना था। उन्होंने दोहराया कि सामान्य तौर पर जमानत मिलना एक सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए, हालांकि कुछ विशेष कानूनों में जमानत देने के लिए कड़े प्रावधान निर्धारित हैं।

लंबी हिरासत और न्यायिक प्रक्रिया पर भी जताई चिंता

इससे पहले उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के संदर्भ में कौल ने लंबी न्यायिक प्रक्रिया पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि दोष सिद्ध होने या बरी होने से पहले का समय भी कई बार अपने आप में सजा बन जाता है।

2020 में हुई थी दोनों की गिरफ्तारी

इस मामले में शरजील इमाम को 25 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जबकि उमर खालिद की गिरफ्तारी 13 सितंबर 2020 को हुई थी। दोनों ने मामले में जमानत के लिए अदालत का रुख किया था, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 2 सितंबर 2025 को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, इसी मामले में अन्य पांच आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दी गई थी।

जमानत पर पूर्व जज संजय किशन कौल की टिप्पणी

इस मामले के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने जमानत और लंबी न्यायिक प्रक्रिया पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि दोष सिद्ध होने या बरी होने से पहले का समय कई बार अपने आप में सजा बन जाता है। उनके अनुसार, ज्यादातर मामलों में जमानत मिलना सामान्य बात होनी चाहिए, हालांकि कुछ विशेष कानूनों में जमानत को लेकर कड़े प्रतिबंध हैं।

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