DHARM DESK :- पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के लिए पिंडदान करने की परंपरा गयाजी में की जाती है। लेकिन यहां एक ऐसी धार्मिक परंपरा भी निभाई जाती है। जिसमें व्यक्ति जीवित रहते हुए ही अपना श्राद्ध और पिंडदान कर सकता है। इसे ‘आत्म-श्राद्ध’ या ‘जीवित पिंडदान’ कहा जाता है। गयाजी के भस्मकूट पर्वत क्षेत्र में स्थित जनार्दन मंदिर को इस परंपरा से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहां भगवान विष्णु जनार्दन रूप में विराजमान हैं। आत्म-श्राद्ध का विधान खास परिस्थितियों में किया ाजाता है। विशेष रूप से वे लोग यह अनुष्ठान करते है, जिनकी कोई संतान या उत्तराधिकारी नहीं है। इसके अलावा संन्यास और वैराग्य का जीवन अपनाने वाले लोग भी इस परंपरा से जुड़े माने जाते है। जीवन रहते अपना श्राद्ध कर लेने से व्यक्ति सांसारिक मोह और अहंकार से मुक्ति की ओर बढ़ता है और मोक्ष की कामना करता है। सनातन धार्मिक परंपरा में मनुष्य के जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष माना गया है । इसी कारण आत्म-श्राद्ध को भी कुछ श्रद्धालु जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति की कामना से जोड़कर देखते है। संन्यासियों के लिए यह भाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि संन्यास का मूल उद्देश्य ही सांसारिक जीवन और मोह-माया से विरक्ति है । इस तरह आत्म-श्राद्ध केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था में जीवन रहते अपने अंतिम संस्कार और मोक्ष की कामना से जुड़ा विशेष विधान माना जाता है ।

भस्मकूट पर्वत क्षेत्र में स्थित है मंदिर

गया जिले का जनार्दन मंदिर भस्मकूट पर्वत क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र गया के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। प्रेतशिला के आस-पास के तीर्थ क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु यहां जनार्दन स्वरूप में विराजमान है । गयाजी में पिंडदान और श्राद्ध से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल है । पितृपक्ष इन दिनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। जनार्दन मंदिर भी इसी धार्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां होने वाले आत्म-श्राद्ध के कारण इस मंदिर की अलग धार्मिक पहचान बनी हुई है।

जीवन रहते अपने लिए पिंडदान

सामान्य तौर पर पिंडदान किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिजन करते हैं। लेकिन आत्म-श्राद्ध में व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपने निमित्त श्राद्ध और पिंडदान का विधान पूरा करता है। इसे ‘जीवित पिंडदान’ भी कहा जाता है ।
यह अनुष्ठान मुख्य रूप से दो तरह की परिस्थितियों से जोड़ा जाता है।

  1. जिनकी कोई संतान या ऐसा उत्तराधिकारी नहीं है, जो मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार और पिंडदान कर सके।
  2. जिन्होंने गृहस्थ जीवन और सांसारिक मोह-माया का त्याग कर संन्यास या वैराग्य का मार्ग अपना लिया है।

मोह और अहंकार से मुक्ति की धार्मिक मान्यता

आत्म-श्राद्ध के पीछे धार्मिक रूप से जीवन की नश्वरता को स्वीकार करने और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने की भावना मानी जाती है । मान्यता है कि व्यक्ति जब अपने लिए जीवन रहते श्राद्ध करता है तो वह मोह, अहंकार और देह से जुड़े लगाव को छोड़ने का संकल्प लेता है।