संयुक्त राष्ट्र (UN) के बयानों में भारत और फ्रांस/यूरोप के विरोध प्रदर्शनों पर अलग-अलग रुख को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार को लेकर भी डबल स्टैंडर्ड अपनाया जाता है. UN के संगठन भी अपनी सहूलियत और सुविधा के हिसाब पर चुनिंदा देशों को निशाना बनाते हैं. भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में स्पष्ट किया है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं होना चाहिए.
भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और फ्रांस समेत दुनिया के कई हिस्सों में हो रहे प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) के रुख पर सवाल उठाए जा रहे है.
भारत के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई पर जहां UN ने चिंता जताई थी तो वहीं फ्रांस के प्रोटेस्ट पर उसने कहा कि आगे बढ़ने का सबसे अच्छा और एकमात्र रास्ता समावेशी और सुरक्षित बातचीत है. UN के इस डबल स्टैंडर्ड पर भारत का सवाल है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सभी देशों के लिए समान मानदंड अपनाती हैं या उनकी प्रतिक्रिया राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदल जाती है?
UN ने भारत के प्रोटेस्ट पर “चिंता” जताई, जबकि फ्रांस और यूरोप के हिंसक प्रदर्शनों पर “संवाद” की बात कही, जिस पर भारत ने UN में कड़ा ऐतराज जताया है. भारत की ओर से विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने दो टूक कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों के साथ भारत का जुड़ाव हमेशा से रहा है, लेकिन यह संवाद, परामर्श, सहयोग, गैर-भेदभाव और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए.
उन्होंने चेतावनी दी कि बिना पुष्टि किए गए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर लगाए गए आरोपों को किसी फैसले की तरह नहीं माना जाना चाहिए. उन्होंने सदस्य देशों से मानवाधिकार रिपोर्टों को सही संदर्भ में देखने और अपुष्ट आरोपों के आधार पर किसी देश की नकारात्मक छवि बनाने से बचने की अपील की.
संयुक्त राष्ट्र (UN) की कार्यप्रणाली और बयानों में दोहरे मापदंड को बेनकाब करते हुए भारत ने दो टूक कहा है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को टार्गेट करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
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