हेमंत शर्मा, इंदौर। नगर निगम में सफाई कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। वर्षों से लंबित मांगों पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए कर्मचारियों ने निगम परिसर में धरना शुरू कर दिया है। सफाई कर्मचारी यूनियन के समर्थन से 48 घंटे की हड़ताल का ऐलान किया गया है। कर्मचारियों का दावा है कि आंदोलन के पहले दिन करीब 90 फीसदी कर्मचारी काम से दूर रहे। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी मांगें आज की नहीं, बल्कि पिछले 23 वर्षों से लंबित हैं। इस दौरान सरकार और प्रशासन के सामने कई बार ज्ञापन दिए गए, आंदोलन किए गए और अलग-अलग तरीकों से अपनी आवाज उठाई गई, लेकिन कर्मचारियों के मुताबिक कई प्रमुख मांगों पर अब तक ठोस फैसला नहीं हो सका है।
स्थायी नौकरी की मांग, 700 से ज्यादा कर्मचारियों की बहाली का मुद्दा
सफाई कर्मचारियों ने स्थायीकरण को अपनी प्रमुख मांगों में शामिल किया है। इसके साथ ही एनजीओ और निजी कंपनियों के जरिए सफाई व्यवस्था संचालित करने के बजाय कर्मचारियों को सीधे नगर निगम के माध्यम से रोजगार देने की मांग की जा रही है।कर्मचारियों ने हटाए गए 700 से ज्यादा सफाई कर्मचारियों की दोबारा बहाली की मांग भी उठाई है। इसके अलावा मेडिकल आधार पर नियुक्तियां करने की मांग को लेकर भी कर्मचारी लामबंद हैं।
रैली से भूख हड़ताल तक, फिर भी नहीं निकला समाधान
कर्मचारी प्रतिनिधियों के मुताबिक, अपनी मांगों को लेकर पहले वाहन रैली, भूख हड़ताल, अनशन और मानव श्रृंखला जैसे कई आंदोलन किए जा चुके हैं। हाल ही में कर्मचारियों ने करीब 13 दिनों तक भूख हड़ताल भी की थी। इसके बावजूद मांगों का समाधान नहीं होने से कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ती गई। कर्मचारियों का दावा है कि नगर निगम आयुक्त की ओर से उनकी मांगों को लेकर राज्य शासन को प्रस्ताव भी भेजा गया था। लेकिन प्रस्ताव भेजे जाने के करीब दो महीने बाद भी निर्णय नहीं होने का आरोप लगाते हुए कर्मचारियों ने अब दोबारा आंदोलन का रास्ता अपनाया है।
90 फीसदी कर्मचारी हड़ताल पर
48 घंटे की हड़ताल के पहले दिन कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में काम से दूरी बनाई। कर्मचारी प्रतिनिधियों के अनुसार, करीब 90 फीसदी सफाई कर्मचारी हड़ताल में शामिल रहे। वहीं कुछ कर्मचारी काम पर पहुंचे, जिन्हें भी आंदोलन में शामिल होने की अपील की गई। अब सवाल यह है कि 23 साल से चली आ रही मांगों का आखिर समाधान कब होगा? हर बार ज्ञापन, आंदोलन और आश्वासन के बाद भी यदि कर्मचारियों की मांगें लंबित रहती हैं, तो इसका जिम्मेदार कौन है? 48 घंटे की यह हड़ताल सिर्फ कर्मचारियों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि नगर निगम की व्यवस्था और लंबे समय से लंबित मांगों पर प्रशासन की गंभीरता की भी परीक्षा है।
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