जीवन सूक्त : मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। अमृतबिन्दु उपनिषद् के इस श्लोक का अर्थ है मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है। मन को दूसरों के मोह में बांधने के बजाय विवेक और आत्मविश्वास से जोड़िए। भागने से नहीं ठहरने से होती है ज़िंदगी से मुलाक़ात। शांत बैठकर स्वयं से संवाद करना एक अदभुत कला है। स्वयं के इतर हम पूरा-पूरा जीवन दूसरों को विचारने में गंवा देते हैं। किसी के एक संदेश, एक फोन या थोड़े-से अपनत्व के लिए हम जीवन भर प्रतीक्षा भी करने को राज़ी होते हैं। किसी की नाराजगी दूर करने के लिए हम निर्दोष होकर भी झुकने को तैयार होते हैं। कोई दूरी बनाता है तो हम बेचैन होकर उसे मिटाने में जुट जाते हैं। आत्मसम्मान खोकर भी किसी का स्नेह पात्र बनना स्वीकार्य होता है मगर सच्चाई यह है कि किसी रिश्ते को बचाए रखना किसी एक की ज़िम्मेदारी नही होती। “Respect yourself, and others will respect you.” स्वयं का सम्मान कीजिए तब ही दूसरों का सम्मान पाने के हक़दार बनेंगे।

प्रेम वह नहीं जिसमें आपको अपनी पहचान मिटानी पड़े बल्कि प्रेम वह है जिसमें आप स्वयं को पहचान सकें। “You cannot pour from an empty cup.” 
कोई भी व्यक्ति खुद भीतर से खाली रहकर दूसरों किसी भी क़ीमत में खुशियाँ नहीं दे सकता। सच्चे रिश्ते में अपनापन, सम्मान और प्रयास दोनों ओर से होते हैं। लेकिन जहाँ भावनाओं को महत्व न मिले वहाँ ठहरकर एक बार फिर विचार करना आवश्यक है। “Never make someone a priority when all you are to them is an option.” किसी ऐसे व्यक्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता मत दीजिए जिसके लिए आप केवल एक विकल्प हैं।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के अनुसार “जिस प्रकार बहुत सी नदियों का जल समुद्र में समाकर भी उसे विचलित नहीं करता, वैसे ही इच्छाओं के बीच जो व्यक्ति स्थिर रहता है, वही वास्तविक शांति प्राप्त करता है।” हर व्यक्ति को जवाब देना, हर बुलावे पर पहुँच जाना और हर रिश्ते को बचाए रखना आपके अकेले की जिम्मेदारी नहीं है। सम्बन्धों में दूरी स्वयं को समझने और सँभालने का अवसर होता है। आपकी कीमत आपके व्यक्तित्व, विचारों, कर्मों और आत्मसम्मान में निहित है।

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का अर्थ है “‘धैर्य और विवेक के साथ धीरे-धीरे मन को शांत करना चाहिए और उसे अपने भीतर स्थिर करना चाहिए।” सबसे पहले अपनी खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर रहना छोड़िए, अपने काम, सपनों, स्वास्थ्य और प्रियजनों के लिए समय निकालिए। प्रेम कीजिए, लेकिन स्वयं को पसंद करना मत भूलिए। रिश्ते निभाइए, लेकिन अपनी गरिमा को जीवित रखिए। “Let go of what you cannot control.” अर्थात् जिस पर आपका नियंत्रण नहीं है, उसे आवश्यकतानुसार स्वीकार करना और छोड़ना सीखिए। तभी जीवन में सुख और संतुलन का मार्ग खुल पाएगा।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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