जीवन सूक्त : “Be yourself; everyone else is already taken.” बहुतायत मनुष्यों के साथ एक बड़ी विडंबना यही रहती है कि वे दूसरों को खुश करने की कोशिश में खुद को ही बिसरा देते हैं। सभी की यही अभिलाषा होती है कि लोग उनकी तारीफ करें, उन्हें समझें, उनकी बातों को महत्व दें और उन्हें पसंद करें। लेकिन होता यह है कि इस कोशिश में वे अपनी वास्तविक पहचान, अपनी पसंद और अपनी आंतरिक शांति से दूर होते चले जाते हैं। दूसरे अर्थों में यह पंक्ति भी बड़ी कारगर है “Too many cooks spoil the broth.” यानी हर किसी की राय के अनुसार चलने से अपना विवेक और निर्णय कमजोर हो सकता है।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः। संस्कृत का यह सुभाषित कहता है कि परिश्रमी और साहसी व्यक्ति के पास ही सफलता आती है। दूसरों की स्वीकृति से अधिक अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए। ज़रा सोचिए, कितनी बार किसी की उपेक्षा ने आपका मन दुखाया है? कितनी बार किसी की आलोचना से आपका आत्मविश्वास डगमगाया है ? और कितनी बार आपने केवल दूसरों को प्रसन्न करने के लिए अपनी इच्छाओं को दबाया है? इसका सीधा-सीधा मतलब यही होता है कि आपने अपनी खुशी की चाबी दूसरों के हाथों में सौंप रखी है। “No one can make you feel inferior without your consent.” इसका मतलब प्रासंगिक और साफ़ है कि जब तक आप स्वयं को कमतर नहीं मानते तब तक दूसरों की राय आपका मूल्य तय नहीं कर सकती।
मन क्रम बचन कपट तजि जोई। करइ भुसुंडि राम पद होई॥
रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड की इस चौपाई के भाव हैं मन, कर्म और वचन में कपट छोड़कर सच्चाई अपनाने से जीवन में सहजता और शांति आती है। हमेशा याद रखिए जो खुशी दूसरों की प्रशंसा से पैदा होती है वह दूसरों की उपेक्षा से बिखर भी सकती है इसलिए कहा जाता है “Be yourself; everyone else is already taken.” अर्थात् स्वयं बनकर रहिए क्योंकि आपकी असली पहचान ही आपकी सबसे विशेषता है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जो कभी किसी को प्रभावित करने की कोशिश में नही रहते, अनावश्यक बहस से दूर रहते हैं और अपनी तुलना दूसरों से नहीं करते। फिर भी वे लोगों का सम्मान पाते हैं। इसका कारण है उनका आत्मविश्वास, सहज व्यवहार और स्वयं के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण उनका यही गुण लोगों के मन में अलग धारणा बनाता है। इसका अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है कि हमें दूसरों की परवाह करना छोड़ देना चाहिए। दूसरों का सम्मान करते हुए अपनी आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए हमें दूसरों का सम्मान करना चाहिए। अपनी गलतियों को सहर्ष स्वीकार करें, स्वयं को बेहतर से बेहतरीन बनाएं और अपनी कमियों यथा सम्भव और यथा शीघ्र दूर क़रें। सिर्फ़ लोगों की स्वीकृति पाने के लिए अपना व्यक्तित्व न बदलें। “Happiness depends upon ourselves.” यही सच्चाई है कि खुशी का वास्तविक आधार हमारे अपने विचार और दृष्टिकोण हैं।
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥
रामचरितमानस के बालकाण्ड की यह चौपाई कहती है कि संसार में गुण और दोष दोनों हैं। विवेकशील व्यक्ति दोषों में उलझने के बजाय गुणों को ग्रहण करता है। यही हम सब को भी करना है। याद रखिए न अकेले रहना कमजोरी है और ना ही भीड़ में रहना सफलता की गारंटी है।वस्तुतः सच्ची शक्ति स्वयं को समझने, अपनी भावनाओं को स्वीकारने और अपने भीतर संतुलन बनाए रखने में है। “Know thyself.” इसी भाव को प्रकट करने के लिए संस्कृत का वाक्य है आत्मानं विद्धि इन दोनो ही शब्दों के भाव सामान है कि स्वयं को जानना ही आत्मविकास की पहली सीढ़ी है। दुनिया को खुश करने से पहले स्वयं को खुश रखने का राज समझिए क्योंकि अपनी क्षमताओं, कमजोरियों और वास्तविक इच्छाओं को पहचानना ही आत्मज्ञान की शुरुआत है।
खुद की कद्र करने वालों को दूसरों की राय अधिक प्रभावित नही करती। निस्संदेह दूसरों से प्रेम कीजिए, सभी का सम्मान कीजिए और अपने संबंधों को संजोइए लेकिन अपनी खुशी और आत्मसम्मान को किसी की स्वीकृति का दास मत बनाइए। दुनिया के बीच रहते हुए भी अपने शांति, संतुलन और आत्मविश्वास बनाए रखना जीवन का वास्तविक आनंद है।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H

