“Before you judge a man, walk a mile in his shoes.” मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है वो दूसरों की कमियाँ बहुत जल्दी देख लेता है और अपनी ख़ामियों को स्वीकार करने में संकोच करता है। दूसरों की छोटी ग़लतियों पर टिप्पणी करने वाला अपनी बड़ी से बड़ी भूल को भी सही ठहराने के लिए बहाने और तर्क खोजता है। जगत में उपदेश देने वालों की भरमार है लेकिन अपने जीवन में उसी उपदेश को आचरण में उतारने वाले बहुत कम हैं।

“Don’t judge others before knowing yourself.” या पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥ ऐसी कुछ पंक्तियाँ ऐसी परिस्थितियों के लिए ही बनी हैं। बेहतर है दूसरों को परखने से पहले स्वयं को समझना। अटल सत्य है आत्मनिरीक्षण से ही व्यक्तित्व में परिष्कार लाया जा सकता है।

प्रतिदिन अपने विचार, व्यवहार और कर्मों का मूल्यांकन करते हुए उसे माँजना आवश्यक है क्योंकि यही वह कर्म है जिसके बाद ही धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें सुधारने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। क्षणिक संतोष देने वाली परनिंदा उस ज़हर के समान है जो आत्मचिंतन और स्थायी विकास की सोंच को मार डालती है।

अपने भीतर विनम्रता, करुणा और समझ ऐसी विकसित कीजिए कि किसी में दोष देखकर हम स्वयं से पूछ सकें कि “क्या मुझसे भी ऐसी भूल हो सकती है?” “People who live in glass houses should not throw stones.” इसका अर्थ आप सभी का जाना पहचान है कि जिसमें स्वयं कमियाँ हों उसे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।

आत्मज्ञान से ही होती है विवेक की शुरुआत है इसके लिए एक प्रसिद्ध कहावत है “Self-knowledge is the beginning of wisdom.” । याद रखिए आत्मकल्याण का मार्ग दूसरों को बदलने से नहीं स्वयं को बेहतर बनाने से शुरू होता है।“Look within before you look around.” दूसरों को देखने से पहले अपने भीतर झाँकिए या “Physician, heal thyself.” दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारो। जीवन में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत उस दिन से ही होती है जिस दिन मनुष्य स्वयं को समझना शुरू करता है। स्मरण रहे जीवन का दर्पण दूसरों की कमियाँ देखने के लिए नही अपने दाग़ निहारने के लिए है।


संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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