जीवन सूक्त : जीवन का एक सरल सत्य जिसे सुनकर शायद हंसी आ जाए लेकिन यदि इसे समझ लिया जाए तो जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल सकता है, वह चमत्कारिक मंत्र है ‘मस्त रहिए सब कुछ अपने आप बेहतर हो जाएगा।’
मगर सवाल यह उठता है कि नौकरी की चिंता, आर्थिक संकट, रिश्तों में तनाव और अनिश्चित भविष्य के साथ कोई मस्त कैसे रह सकता है? आमतौर पर सोचा जाता है कि पहले सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँ, बैंक में कुछ बैलेन्स आ जाएँ, परिवार में सब ठीक हो जाए, सेहत में तंदरुस्ती आ जाए तब ही खुश हुआ जा सकता है। इतना तो सभी जानते हैं कि मन की इच्छाओं का कोई अंत नहीं, लाख मिलेंगे तो दस लाख की चिंता सताएगी, एक समस्या सुलझेगी तो दूसरी सामने आ खड़ी होगी। यह सभी का अनुभ व होगा कि खुशी को भविष्य पर टालते-टालते वर्तमान भी हाथ से निकल जाता है। अंग्रेज़ी कहावत “Worry never robs tomorrow of its sorrow, it only saps today of its joy.” का अर्थ है चिंता कल का दुख नहीं मिटाती बल्कि आज की खुशी भी छीन लेती है।
सच्ची खुशी बेशर्त मिलनी चाहिए यदि हमारी प्रसन्नता किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर है तो उस व्यक्ति या परिस्थिति के बदलते ही हमारी खुशी भी छिन सकती है। इसलिए इस बात के लिए सचेत रहें कि आनंद का स्रोत बाहर नहीं, हमारे भीतर होना चाहिए। संतुष्ट मन के लिए उपयुक्त अंग्रेज़ी कहावत है “A contented mind is a perpetual feast.” इसका आशय है संतुष्ट मन के लिए हर दिन उत्सव है।
समत्वं योग उच्यते॥ श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का भावार्थ है “सुख-दुःख और सफलता-असफलता में मन का संतुलन बनाए रखना ही योग है।”
अपनी मस्ती में रहने का अर्थ यह नहीं कि हम जिम्मेदारियों से भाग जाएँ या समस्याओं को अनदेखा करें। इसका अर्थ है समस्याओं का सामना शांत मन से करना, परिस्थितियों को स्वीकार करना और समाधान के लिए सकारात्मक प्रयास करना। हर बात पर लड़ना, हर घटना से परेशान होना और हर व्यक्ति को बदलने की कोशिश करना एक थका देने वाली प्रक्रिया है। यह बहुत बड़ा सौभाग्य है कि हम जीवित हैं, सांस ले रहे हैं, हमारे पास आज का दिन है और कुछ बेहतर करने का अवसर है। “Keep your face always toward the sunshine.” इस पंक्ति का संदेश है, अपना ध्यान हमेशा आशा और सकारात्मकता की ओर रखिए।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥
श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसिद्ध श्लोक का भावार्थ है मन की प्रसन्नता और शांति की उपस्तिथि से दुःखों का प्रभाव कम होता है और बुद्धि स्थिर होती है।
जीवन में आनंद का पदार्पण तब होता है जब हम हर परिस्थिति के ठीक होने की प्रतीक्षा छोड़कर वर्तमान में जीना सीख लेते हैं। जिम्मेदारियाँ निभाइए, प्रयास कीजिए, लेकिन अपने आनंद को भविष्य के भरोसे मत छोड़िए। मस्त रहिए, सजग रहिए, प्रसन्न रहिए और जीवन को पूरी तरह जीना सीखिए।
“जीवन की हर समस्या समाप्त होने के बाद ही खुशी मिलेगी” इससे भ्रामक पंक्ति आज तक बनी नही। सच्चा आनंद वर्तमान को स्वीकार करने में, मन को संतुलित रखने में और जिम्मेदारियों को प्रसन्नता के साथ निभाने में है। खुश रहने के लिए कारण खोजने की जगह, उपलब्ध छोटी-छोटी खुशियों को पहचानना सीखिए।
संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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