मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति भी मन है और चुनौती भी मन ही है। “Mind over matter.” अँग्रेज़ी की इस पंक्ति का अर्थ है दृढ़ इच्छाशक्ति से कठिनाइयों पर विजय पाई जा सकती है। बस मन हमारे नियंत्रण में हो तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आसानी से धैर्य, साहस और आत्मविश्वास बना कर रखा जा सकता है। इस भावना को बल देने वाली रामचरित मानस की चौपाई सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥ यानी सच्चा साहसी व्यक्ति अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय कर्म से अपनी क्षमता सिद्ध करता है। इसके विपरीत यदि हम अपने मन के हर विचार, डर और इच्छा के पीछे चलने लगते हैं तब वही मन हमारा स्वामी बन जाता है।
मनुष्य का मन ही बंधन है और हर बंधन से मुक्ति का द्वार है। विषयों में आसक्त मन बंधन में डालता है और आसक्ति से मुक्त मन उन्मुक्त बनाता है। मन के इस स्वभाव पर आधारित एक प्रसिद्ध सुभाषित है मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥ स्पष्ट रूप से हमें समझना होगा कि मन हमारा है मगर हम मन के नहीं हैं। मन को प्रेम, धैर्य और अभ्यास से प्रशिक्षित करना गहरी साधना है। जिस तरह एक जंगली घोड़े को प्रशिक्षण देकर ही उसे वांछित दिशा में दौड़ाया जा सकता है उसी प्रकार चंचल मन को भी सही प्रशिक्षण देकर जीवन को सफल बनाया जा सकता है। असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का अर्थ है मन चंचल है और इसे नियंत्रित करना कठिन है लेकिन निरंतर अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
याद रखिए, मन से संघर्ष करने का अर्थ उससे युद्ध करना नहीं बल्कि उसे समझकर और समझाकर अपना सहयोगी बनाना है। जिस दिन आपके सारे निर्णय आपके विचार, विवेक और मस्तिष्क से आने लगेंगे उसी दिन से आपके जीवन में परिवर्तन की शुरुआत हो जाएगी। आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ कठोपनिषद् के इस श्लोक का अर्थ है यदि शरीर रथ है तो आत्मा उसका यात्री, बुद्धि सारथी और मन लगाम के समान है। बुद्धि के सही दिशा निर्देश में मन, जीवन यात्रा को सार्थक बनाता है।
सदियों से कहा जा रहा है “You are the master of your destiny.” व्यक्ति का चुनाव, कर्म और प्रयास ही उनके जीवन की दिशा तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। याद रखिए, हर नकारात्मक विचार सत्य नहीं होता इसलिए जब मन कहे कि यह कार्य असम्भव है तब एक बार जाँच ले कि क्या यह सचमुच मेरी क्षमता की सीमा है या यह केवल मेरा डर है ? ।आत्मविश्वास का वास्तविक आधार ही है अपने विचारों को परखना, अपनी क्षमताओं को पहचानना और सकारात्मक कदम उठाना। उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसिद्ध श्लोक में इस बात का उल्लेख है कि मनुष्य को स्वयं अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए। हमारा मन ही हमारा मित्र और शत्रु दोनों है।
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय॥ बृहदारण्यक उपनिषद् का यह श्लोक एक प्रार्थना भी है जिसका अर्थ है हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और सीमित चेतना से उच्चतर जीवनबोध की ओर ले चलो।
“As you think, so shall you become.” इस पंक्ति का अर्थ है आपके विचार आपके व्यक्तित्व और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। अपने आप से कहते रहिए मैं शांत हूँ, प्रसन्न हूँ, विपरीत परिस्थितियों में भी साहसी हूँ, सक्षम हूँ, और अपनी ग़लतियों से सीखने के लिए प्रयासरत हूँ। आप महसुस करेंगे यह शब्द, संकल्प की तरह काम करते हैं।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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