रांची। झारखंड में करीब ढाई दशक से चले माओवाद विरोधी अभियान के बाद राज्य में माओवादी संगठनों का प्रभाव बड़े पैमाने पर कमजोर हुआ है। सुरक्षा अभियानों, माओवादियों के आत्मसमर्पण, गिरफ्तारियों और पुनर्वास नीति के जरिए कई संगठनों का अस्तित्व समाप्त हुआ है। इस लंबे संघर्ष में झारखंड पुलिस और केंद्रीय बलों के 600 से अधिक जवानों और अधिकारियों के बलिदान का उल्लेख किया गया है।

सैकड़ों माओवादी मारे गए, बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण

पिछले वर्षों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई के चलते कई माओवादी कमांडर मारे गए, जबकि बड़ी संख्या में उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना। मई 2026 में ही 25 CPI (माओवादी) और दो JJMP सदस्यों समेत 27 उग्रवादियों ने रांची में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था। उनके पास से एलएमजी, इंसास और एसएलआर राइफल समेत बड़ी संख्या में हथियार और करीब 3,000 कारतूस बरामद किए गए थे।

26 साल में 682 अत्याधुनिक हथियार बरामद

माओवादी विरोधी अभियान के दौरान सुरक्षा बलों ने उग्रवादियों के कब्जे से 682 अत्याधुनिक हथियार बरामद किए। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे हथियार शामिल बताए जाते हैं, जिन्हें माओवादियों ने सुरक्षा बलों से लूटा था। हथियारों की बरामदगी ने माओवादी संगठनों की हथियार क्षमता को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कई बड़े संगठन हुए कमजोर

झारखंड में कभी सक्रिय रहे कई माओवादी और उग्रवादी संगठनों का प्रभाव अब काफी सीमित हो गया है। सुरक्षा बलों और जांच एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई के साथ ही आर्थिक नेटवर्क पर कार्रवाई ने भी संगठनों की गतिविधियों को प्रभावित किया है।

हालांकि, झारखंड पुलिस की मौजूदा सूची में अभी भी कुछ फरार नक्सलियों और इनामी उग्रवादियों के नाम दर्ज हैं। ऐसे में राज्य में माओवादी गतिविधियों के खिलाफ अभियान पूरी तरह समाप्त होने के बजाय अंतिम चरण में जारी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।