रांची। झारखंड सरकार ने केंद्र के MMDR Amendment Act, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी तेज कर दी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मंजूरी के बाद राज्य सरकार ने इस मामले में कानूनी कदम आगे बढ़ाने का फैसला किया है। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के मुताबिक, संशोधित कानून का असर खनिज सेस से होने वाली राज्य की संभावित आय और पुराने बकाये के दावे पर पड़ सकता है।
2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाएगी आधार
राज्य सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले के बाद झारखंड ने खनिजों पर सेस लगाने और उसकी वसूली की प्रक्रिया शुरू की थी। अब केंद्र के संशोधित कानून में राज्यों के खनिजों पर अतिरिक्त कर या सेस लगाने के अधिकार को सीमित किए जाने का राज्य सरकार विरोध कर रही है।
झारखंड सरकार का तर्क है कि संसद के नए संशोधन से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर राज्यों को मिले अधिकार प्रभावित होते हैं। इसी कानूनी आधार पर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी में है।
14 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का मुद्दा
झारखंड सरकार ने खनिज सेस से वित्तीय वर्ष 2026-27 में करीब 14 हजार करोड़ रुपये की आय का अनुमान लगाया था। राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर भी इस संभावित राजस्व प्रभाव का उल्लेख कर चुके हैं।सरकार का कहना है कि संशोधित कानून लागू होने से राज्य को इस अनुमानित आय से वंचित होना पड़ सकता है।
1.36 लाख करोड़ रुपये के बकाये का दावा भी अहम
MMDR संशोधन के साथ झारखंड सरकार के करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये के पुराने खनिज संबंधी बकाये का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है। राज्य सरकार ने लंबे समय से केंद्र और कोयला कंपनियों से जुड़े विभिन्न मदों में इस राशि का दावा किया है।
राज्य सरकार का कहना है कि नए कानून का असर इस पुराने दावे की वसूली पर भी पड़ सकता है और इसी मुद्दे को लेकर वह कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाएगी।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लागू हुआ संशोधन
MMDR Amendment Act, 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून लागू हो चुका है। संशोधन को लेकर झारखंड सरकार लगातार आपत्ति दर्ज कराती रही है और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इसके खिलाफ संवैधानिक और कानूनी स्तर पर लड़ाई जारी रखने की बात कही थी।
अब राज्य सरकार की नजर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित याचिका पर है। इस मामले में अदालत के सामने खनिज सेस लगाने के अधिकार, राज्य के राजस्व हित और पुराने बकाये से जुड़े कानूनी सवाल प्रमुख मुद्दे होंगे।



