रांची . झारखंड में चिकित्सकों की लंबित मांगों को लेकर आंदोलन तेज होने लगा है। मंगलवार को रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) के प्रशासनिक भवन में डॉक्टरों ने काला बिल्ला लगाकर विरोध जताया। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और झारखंड स्वास्थ्य सेवा संघ (झासा) के संयुक्त आंदोलन के तहत आयोजित इस प्रदर्शन में वरिष्ठ चिकित्सकों के साथ जूनियर डॉक्टरों ने भी भाग लिया। चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा से लेकर वेतन-भत्तों और मेडिकल कॉलेजों की शैक्षणिक व्यवस्था तक कई समस्याओं का समाधान जरूरी है।
प्रदर्शनकारियों ने मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने, समयबद्ध पदोन्नति, नियमित नियुक्तियों और मेडिकल विद्यार्थियों से जुड़ी समस्याओं के निराकरण की मांग की। डॉक्टरों ने 22 अक्टूबर से प्रस्तावित कार्य बहिष्कार के समर्थन में भी आवाज उठाई।
हॉस्टल, स्टाइपेंड और फैकल्टी की कमी से नाराजगी
चिकित्सकों ने मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं की बदहाली पर सवाल उठाए। पूर्व जेडीए अध्यक्ष जयदीप चौधरी के मुताबिक, विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से पर्याप्त फैकल्टी और प्रशिक्षण संबंधी संसाधन नहीं हैं। इससे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है।
उन्होंने दुमका मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में तीन दिनों तक पानी की आपूर्ति बाधित रहने और पलामू मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई घंटों तक बिजली नहीं रहने का मुद्दा उठाया। उन्होंने रिम्स में भी बुनियादी समस्याएं होने की बात कही। इसके अलावा जूनियर डॉक्टरों को समय पर स्टाइपेंड नहीं मिलने की शिकायत भी सामने रखी गई।
इलाज के दौरान डॉक्टरों की सुरक्षा पर जोर
पूर्व जेडीए अध्यक्ष डॉ. विकास ने कहा कि डॉक्टरों को मरीजों का इलाज करते समय सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए। चिकित्सा के क्षेत्र में हर मरीज को बचा पाना संभव नहीं होता, लेकिन प्रतिकूल परिणामों के बाद चिकित्सकों के साथ हिंसा या मारपीट की घटनाएं स्वीकार्य नहीं हैं।
चिकित्सकों ने मांग की कि अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में सुरक्षा के प्रभावी इंतजाम किए जाएं, ताकि डॉक्टर बिना भय के अपना काम कर सकें और मरीजों को भी बेहतर उपचार मिल सके।
मेडिकल कॉलेजों में संसाधन बढ़ाने की मांग
झारखंड आईएमए के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने कहा कि जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल विद्यार्थियों का भविष्य बेहतर शैक्षणिक माहौल पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि केवल भवनों और बाहरी सुविधाओं का विकास पर्याप्त नहीं है। मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षित कर्मचारियों, पैरामेडिकल स्टाफ, आधुनिक उपकरणों, शोध और क्लिनिकल प्रशिक्षण की सुविधाओं को भी मजबूत करना होगा।
उन्होंने दक्षिण भारत से चिकित्सकों को लाने की सरकार की घोषणा का उल्लेख करते हुए स्थानीय स्तर पर नए डॉक्टरों के सामने संभावित चुनौतियों की बात कही। उन्होंने मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुधारने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
डॉक्टरों की पांच बड़ी मांगें
- सुरक्षा कानून: मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट का प्रभावी क्रियान्वयन और महिला चिकित्सकों की सुरक्षा।
- लाइसेंस व्यवस्था: नैदानिक प्रतिष्ठान अधिनियम में व्यावहारिक बदलाव और सिंगल विंडो लाइसेंस प्रणाली।
- नियुक्ति व पदोन्नति: चिकित्सकों और दंत चिकित्सकों की नियमित नियुक्ति तथा समयबद्ध प्रमोशन।
- लंबित समस्याएं: जूनियर डॉक्टरों, मेडिकल विद्यार्थियों और आयुष्मान भारत से जुड़ी शिकायतों का समाधान।
- जवाबदेही: सरकार और चिकित्सा संगठनों की संयुक्त निगरानी व्यवस्था का गठन।
22 अक्टूबर के प्रस्तावित कार्य बहिष्कार को समर्थन
प्रदर्शन में झारखंड आईएमए के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, पूर्व जेडीए अध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार, डॉ. विकास, डॉ. अभिषेक रामाधीन सहित कई चिकित्सक मौजूद रहे। डॉक्टरों ने मांगों पर ठोस पहल करने की अपील करते हुए कहा कि चिकित्सा संस्थानों में सुरक्षित वातावरण, पर्याप्त संसाधन और बेहतर कार्य व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है।

