रांची। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2023, फूड सेफ्टी ऑफिसर (FSO) और चाइल्ड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर (CDPO) की नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। शुक्रवार को जस्टिस दीपक रौशन की अदालत में मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं, राज्य सरकार और हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अपने-अपने पक्ष में दलीलें रखी गईं।
याचिकाकर्ताओं ने परीक्षाएं रद्द करने के सरकार के फैसले को गलत बताते हुए इसे चुनौती दी, जबकि राज्य सरकार ने जांच में सामने आई कथित बड़े पैमाने की गड़बड़ियों का हवाला देते हुए अपने फैसले को उचित ठहराया।
न पेपर लीक का आरोप, न मनी ट्रेल का सबूत- याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा, अमृतांश वत्स और प्रेरणा झुनझुनवाला ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत में दलील दी कि तीनों परीक्षाओं में सफल अभ्यर्थियों के खिलाफ न तो कोई एफआईआर दर्ज हुई है, न उन्हें समन जारी किया गया और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई है।
वकीलों ने यह भी कहा कि सफल अभ्यर्थियों से जुड़ा ऐसा कोई मनी ट्रेल सामने नहीं आया है, जिससे परीक्षा में पैसों के लेनदेन की पुष्टि हो सके। उनका दावा था कि इन परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का कोई ठोस प्रमाण अब तक सामने नहीं आया है।
TDPL से संबंध के आधार पर परीक्षा रद्द करने पर सवाल
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने सरकार के उस फैसले पर सवाल उठाया, जिसमें तीनों परीक्षाओं को TDPL से कथित संबंध के आधार पर रद्द किया गया है।
दलील दी गई कि जुलाई 2025 में परीक्षा आयोजन में TDPL की कथित भूमिका सामने आने तक इन परीक्षाओं की चयन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी और दस्तावेज सत्यापन का अंतिम चरण चल रहा था। ऐसे में केवल TDPL की कथित संलिप्तता के आधार पर पूरी परीक्षा प्रक्रिया रद्द करना उचित नहीं है।
CID जांच में गड़बड़ी के ठोस साक्ष्य नहीं- याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दावा किया गया कि CID की जांच में अब तक इन तीनों परीक्षाओं में अनियमितता के ठोस साक्ष्य सामने नहीं आए हैं। अधिवक्ताओं ने कई न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए सरकार के निर्णय को चुनौती दी।
उन्होंने आरोप लगाया कि जल्दबाजी और राजनीतिक दबाव में परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया गया, जिससे चयन प्रक्रिया में सफल अभ्यर्थियों के हित प्रभावित हुए हैं। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क था कि परीक्षा के परिणाम और चयन प्रक्रिया को रद्द करने का अधिकार राज्य सरकार के बजाय JPSC के पास है।
सरकार का जवाब- बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के संकेत
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अच्युत केशव ने पक्ष रखा। उन्होंने सबसे पहले याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर सवाल उठाते हुए कहा कि रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
सरकार की ओर से दलील दी गई कि अब तक की जांच में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। ऐसी स्थिति में कथित रूप से प्रभावित अभ्यर्थियों और पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को अलग-अलग करना संभव नहीं है।
सरकार ने कहा कि दागी और बेदाग अभ्यर्थियों की पहचान अलग-अलग करना मुश्किल है। परीक्षा रद्द करने के फैसले के समर्थन में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायिक फैसलों का भी हवाला दिया।
हस्तक्षेपकर्ता ने JPSC की SOP पर उठाए सवाल
मामले में हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुभाषिष रसिक सोरेन ने दलीलें रखीं। उन्होंने JPSC की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन नहीं किए जाने का मुद्दा उठाया।
उन्होंने दावा किया कि JPSC ने अपने एफिडेविट में भी SOP का पालन नहीं किए जाने की बात स्वीकार की है। हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अदालत में 1 मई 2024 का एक दस्तावेज पेश किया गया, जिसमें TDPL को ITI लिमिटेड द्वारा JPSC की 11वीं-13वीं PT परीक्षा में शामिल किए जाने की बात कही गई।
दलील दी गई कि इससे परीक्षा प्रक्रिया में TDPL की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों की जांच जरूरी हो जाती है। इसलिए परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले से जुड़े सभी तथ्यों को अदालत के सामने लाना आवश्यक है।
सोमवार को दोपहर 2:15 बजे फिर होगी सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई सोमवार को दोपहर 2:15 बजे होगी। इस दिन राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता रोहिताश्य रॉय अपना पक्ष रखेंगे। हाईकोर्ट में तीनों परीक्षाओं को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सभी पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं।
बता दें कि 8 अक्टूबर को JSSC की CGL परीक्षा रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर भी जस्टिस दीपक रौशन की अदालत में सभी पक्षों की सुनवाई पूरी हो चुकी है।

