Kaithal District Foundation Day : चंडीगढ़। हरियाणा आज अपना 60वां स्थापना दिवस मना रहा है। इसी खास दिन प्रदेश का कैथल जिला भी अपना जन्मदिन मना रहा है। एक नवंबर 1989 को कुरुक्षेत्र से अलग होकर जिला बने कैथल ने 37 वर्षों में अपनी अलग पहचान बनाई है। कभी ऐतिहासिक कपिस्थली के नाम से पहचाने जाने वाला यह शहर आज खेती, चावल निर्यात, खेल, शिक्षा और धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में अपनी खास जगह रखता है।
कैथल का इतिहास केवल 37 साल पुराना नहीं है। इसकी जड़ें महाभारत काल तक जाती हैं। मान्यता है कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र को कपिस्थली कहा जाता था। समय के साथ यहां कई शासकों का शासन रहा और शहर ने ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनाई।
करनाल से कुरुक्षेत्र और फिर बना अलग जिला
हरियाणा के गठन के समय यानी 1 नवंबर 1966 को कैथल करनाल जिले की तहसील हुआ करता था। वर्ष 1973 में कुरुक्षेत्र को अलग जिला बनाए जाने के बाद कैथल क्षेत्र भी उसमें शामिल हो गया। इसके बाद 31 अक्टूबर 1989 तक यह कुरुक्षेत्र जिले का हिस्सा रहा। आखिरकार 1 नवंबर 1989 को कैथल को अलग जिले का दर्जा मिला।
आज जिले की बड़ी आबादी गांवों में रहती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खेती और मेहनतकश लोगों ने कैथल को प्रदेश के महत्वपूर्ण जिलों में शामिल करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
रजिया सुल्तान से जुड़ा है कैथल का इतिहास
कैथल का इतिहास दिल्ली सल्तनत की शासक रजिया सुल्तान से भी जुड़ा हुआ है। रजिया सुल्तान को भारत की पहली महिला मुस्लिम शासक माना जाता है। इतिहास के अनुसार, 13 नवंबर 1240 को कैथल के पास उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी कब्र आज भी शहर में मौजूद है, जो ऐतिहासिक महत्व रखती है।
इसके अलावा कैथल पर सिख शासकों का भी शासन रहा। यहां के शासक देसू सिंह को सिख गुरु हर राय जी से सम्मान मिला था। इसके बाद यहां के शासकों को ‘भाई’ की उपाधि से जाना जाने लगा। भाई उदय सिंह यहां के अंतिम शासक थे, जिनका शासन 1843 तक रहा।
आठ दरवाजों और सात तालाबों वाला पुराना शहर
कैथल का पुराना शहर अपनी ऐतिहासिक बनावट के लिए जाना जाता है। इसे कभी किले के रूप में विकसित किया गया था। शहर के चारों ओर सात तालाब और आठ प्रवेश द्वार होने का उल्लेख मिलता है। इनमें सीवन गेट, माता गेट, प्रताप गेट, डोगरा गेट, चंदाना गेट, रेलवे गेट, कोठी गेट और क्योड़क गेट शामिल हैं।
भाई उदय सिंह का किला भी शहर की ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समय के साथ इसकी हालत खराब हुई, लेकिन बाद में इसके संरक्षण और नवीनीकरण के प्रयास किए गए।
चावल निर्यात और फिरनी ने बनाई अलग पहचान
कैथल की पहचान केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। खेती और कारोबार के मामले में भी जिले का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां धान की बड़े पैमाने पर खेती होती है। बासमती चावल के कारोबार और निर्यात के लिए भी कैथल जाना जाता है। जिले में 150 से अधिक राइस मिल होने से यहां चावल उद्योग को मजबूती मिली है।
कैथल की प्रसिद्ध फिरनी भी यहां की खास पहचान है। सावन के महीने से पहले ही इसकी मांग बढ़ने लगती है और इसके ऑर्डर दूसरे देशों तक पहुंचते हैं। कैथली बेर भी कभी अपनी खास मिठास और स्वाद के लिए काफी मशहूर रहे हैं।
बेटियों ने खेल से लेकर सेना तक बढ़ाया मान
कैथल की बेटियों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों में जिले का नाम रोशन किया है। यहां की दीपशिखा ने आईएएस बनकर प्रशासनिक सेवा में पहचान बनाई। पद्मश्री ममता सौदा और सीमा गोस्वामी ने पर्वतारोहण के क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल कीं। वहीं मनीषा मौण ने ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर जिले को गौरवान्वित किया।
हाल ही में बालू गांव की पूनम ने सेना में लेफ्टिनेंट बनकर एक और उपलब्धि हासिल की। इसके अलावा जिले की कई बेटियों ने सेना और न्यायिक सेवाओं में भी अपनी जगह बनाई है।
छोटी काशी के नाम से भी मशहूर है कैथल
धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों की मौजूदगी के कारण कैथल को छोटी काशी भी कहा जाता है। यहां भाई उदय सिंह का किला, प्राचीन बावड़ी, नवग्रह कुंड, बिदक्यार झील और गुरुद्वारा नीम साहिब जैसे स्थल मौजूद हैं।
इसके अलावा श्री ग्यारह रुद्री मंदिर, अंबकेश्वर मंदिर, माता अंजनी मंदिर, प्राचीन हनुमान मंदिर और हजरत बाबा शाह कमाल कादरी की दरगाह भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं।
जिले के आसपास पूंडरी का फल्गु तीर्थ, कलायत का कपिल मुनि मंदिर, खड़ालवा का शिव मंदिर और गुहला का यक्ष अरंतुक स्थल भी धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
37 साल में बदल गई जिले की पहचान
कैथल ने जिला बनने के बाद से अब तक लंबा सफर तय किया है। खेती और चावल कारोबार से लेकर शिक्षा, खेल, प्रशासन और पर्यटन तक जिले ने अपनी मजबूत पहचान बनाई है। महाभारतकालीन कपिस्थली से आधुनिक कैथल तक का यह सफर इसकी ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय लोगों की मेहनत की कहानी बयां करता है।
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