अभय मिश्रा, मऊगंज। क्या किसी जिले की पुलिस खुद ही कानून को अपनी जेब में लेकर घूम सकती है? क्या सरकारी नियमों की हैसियत मऊगंज जिले में सिर्फ एक रद्दी कागज के टुकड़े जैसी रह गई है? मऊगंज जिला जब से बना है, तब से ही विवादों और सुर्खियों में है। लेकिन आज जो सच हम आपके सामने लाने जा रहे हैं, उसे पढ़कर आप हैरान रह जाएंगे। सरकार चीख-चीख कर कहती है कि अधिकारी-कर्मचारी मुख्यालय में रहें, लेकिन मऊगंज पुलिस के साहबों का दिल तो रीवा में धड़कता है! सुबह रीवा से मऊगंज आते हैं और शाम ढलते ही वापस रीवा भाग जाते हैं।

लेकिन कहानी सिर्फ ‘अप-डाउन’ की नहीं है। कहानी है मऊगंज पुलिस के उस ‘पॉकेट गवाह’ सिंडिकेट की,है जिसका भंडाफोड़ होने के बाद भी मऊगंज की पुलिस सुधरने को तैयार नहीं है। सरकारी गाड़ियों को सरकारी ड्राइवर नहीं, बल्कि पुलिस के पाले हुए ‘प्राइवेट’ ड्राइवर चला रहे हैं, जो गाड़ियों के स्टेयरिंग भी संभालते हैं और अदालतों में थोक के भाव पुलिस के हक में गवाहियां भी देते हैं। आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह खेल?

नियम-कायदे और कानून… ये शब्द मऊगंज जिले की पुलिस के शब्दकोश से शायद गायब हो चुके हैं। जिला नया है, लेकिन यहां पुलिस के कारनामे पुराने और बदस्तूर जारी हैं। सबसे पहला मजाक तो सरकार के उस आदेश के साथ उड़ाया जा रहा है, जिसमें हर अधिकारी को मुख्यालय में रहने का सख्त निर्देश है। लेकिन मऊगंज पुलिस के अधिकांश कर्मचारी और थाना प्रभारी इस आदेश को ठेंगे पर रखते हैं। इनका ठिकाना मऊगंज नहीं, बल्कि रीवा है। रोज सुबह रीवा से मऊगंज का वीआईपी आगमन होता है और शाम होते ही सरकारी गाड़ियां वापस रीवा की ओर दौड़ने लगती हैं।

लेकिन असली खेल तो थानों के अंदर चल रहा है। मऊगंज का बहुचर्चित ‘पॉकेट गवाह’ मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि पुलिस ने एक बार फिर नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ा दी हैं। जिले के पांचों थानों में सरकारी वाहन चालकों को किनारे बैठा दिया गया है और उनकी जगह निजी यानी प्राइवेट ड्राइवरों से सरकारी गाड़ियां चलवाई जा रही हैं। सवाल यह है कि इन प्राइवेट ड्राइवरों की मऊगंज पुलिस पर ऐसी क्या कृपा है? जवाब है- ‘थोक के भाव गवाही’। ये ड्राइवर सिर्फ गाड़ी नहीं चलाते, बल्कि पुलिस के लिए अदालतों में ‘पॉकेट गवाह’ का काम करते हैं।

अब जरा मऊगंज पुलिस के इन ‘चहेते सारथियों’ के नाम और कारनामे भी पढ़ लीजिए:

हनुमना थाना :यहां पिछले 2 साल से राजेश साकेत नाम का निजी ड्राइवर सरकारी गाड़ी दौड़ा रहा है, जिसने कई मामलों में पुलिस का गवाह बनकर कोर्ट में हाजिरी दी है।

मऊगंज थाना: यहां कई सालों से डी.एस. तिवारी  नाम के निजी चालक का कब्जा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस चालक ने पुलिस के पक्ष में एक ही दिन में 9 मामलों में गवाही देने का ‘रिकॉर्ड’ बनाया है।

शाहपुर थाना: यहां महेंद्र धर द्विवेदी कई वर्षों से थाना प्रभारी की गाड़ी चला रहे हैं और साहब के बगल में बैठकर घूमते हैं। ये भी पुलिस के प्रमाणित ‘पॉकेट गवाह’ हैं।

लौर थाना: यहां निलेश अवस्थी  गाड़ी चला रहे थे, लेकिन जब इन्हें हद से ज्यादा मामलों में पॉकेट गवाह बना दिया गया, तो विवाद बढ़ता देख इन्होंने वाहन चलाना बंद कर दिया।

नईगढ़ी थाना : यहां प्रमोद कुमार द्विवेदी के हाथों में सरकारी स्टेयरिंग है। जब साहब अपनी प्राइवेट गाड़ी से निकलते हैं, तभी इन्हें छुट्टी मिलती है।

हैरानी की बात तो यह है कि जिला मुख्यालय और पुलिस अधीक्षक कार्यालय की नाक के नीचे यह सब चल रहा है। यही प्राइवेट ड्राइवर थाना प्रभारियों को लेकर एसपी ऑफिस तक आते हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बंधी हुई है। जनता चीख-चीख कर शिकायतें कर रही है, लेकिन साहबान मौन हैं। आखिर इन प्राइवेट ड्राइवरों को मानदेय यानी सैलरी कहां से दी जा रही है? सरकारी खजाने से या पुलिस के किसी ‘गुप्त फंड’ से? सरकारी ड्राइवरों को काम से क्यों रोका गया है? क्या मऊगंज पुलिस का कानून सिर्फ आम जनता की जेब ढीली करने के लिए है?

मऊगंज पुलिस की मनमानी का आलम यह है कि यहां पुलिस अधीक्षक (SP) के आदेश भी बौने साबित हो रहे हैं। आरक्षक शिव कुमार दुबे का स्थानांतरण शाहपुर थाने में हुआ है। लेकिन मजाल है कि ये अपनी जगह से हिल जाए! एसपी के आदेश को ठेंगा दिखाकर ये कर्मचारी आज भी पुराने थानों में ही जमे हुए हैं और नई जगह पर आमद तक नहीं दी है। मतलब साफ है कि मऊगंज पुलिस में वरिष्ठ अधिकारियों का खौफ खत्म हो चुका है और यहां कुछ थाना प्रभारियों को बड़े ‘नेताओं’ या ‘अफसरों’ का ऐसा संरक्षण प्राप्त है कि वो खुद को जिले का सुपर पावर समझने लगे हैं।

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