Automobile desk: देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर और ग्रीन एनर्जी बाजार के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आ रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों की डिमांड में लगातार उछाल के बीच भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी आधुनिक केमिकल तकनीक तैयार की है, जिसके जरिए प्राकृतिक समुद्री पानी में मौजूद लिथियम का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सफलतापूर्व बाहर निकाला जा सकता है।

इस वैज्ञानिक उपलब्धि को भारत की ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी आत्मनिर्भरता के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि अब तक बैटरियों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले इस अहम कच्चे माल के लिए देश का अधिकांश आयात दूसरे देशों पर टिका हुआ है।

​वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ ही इलेक्ट्रिक कारों, टू-व्हीलर्स और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (Energy Storage Systems) की मांग तेजी से ऊपर जा रही है। इन सभी मॉडर्न डिवाइसों की रीढ़ लिथियम-आयन बैटरी होती है, जो अपनी उच्च ऊर्जा संग्रहण क्षमता, लंबी कार्यक्षमता और बेहतरीन परफॉर्मेंस के कारण उद्योग की पहली पसंद बनी हुई हैं। हालांकि, भारतीय बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की रफ्तार तो काफी तेज हो चुकी है, मगर बैटरी निर्माण के लिए जरूरी सेल्स और रिफाइंड लिथियम के आयात पर हमारी निर्भरता बहुत अधिक बनी हुई है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव या सप्लाई चेन बाधित होने का सीधा असर घरेलू बाजार में ईवी की लागत पर पड़ता है।

​इस चुनौती से निपटने के लिए BARC के एक्सपर्ट्स ने एक खास केमिकल प्रोसेस ईजाद किया है। इस तकनीक के तहत सबसे पहले सोडियम कार्बोनेट और सोडियम हाइड्रॉक्साइड की मदद से पानी के पीएच (pH) स्तर को चरणबद्ध तरीके से नियंत्रित किया जाता है, जिससे पानी में घुले कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे अन्य अनावश्यक तत्व आसानी से अलग हो जाते हैं। शोध के अनुसार, इस प्रक्रिया में 99 प्रतिशत से ज्यादा अवांछित तत्व हट जाते हैं, जबकि लिथियम सुरक्षित रूप से पानी में बना रहता है। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी जटिलता यही थी कि अन्य खनिजों को बाहर निकालते समय लिथियम की मूल मात्रा को सुरक्षित रखा जाए।

​इस रासायनिक प्रक्रिया में पानी और ऑर्गेनिक सॉल्वेंट का अनुपात 10:1 यानी 1 लीटर पानी पर लगभग 100 मिलीलीटर सॉल्वेंट रखा गया। इसके अलावा, एमआईबीके (MIBK) सॉल्वेंट लिथियम केमिकल कॉम्प्लेक्स को स्थिर बनाए रखने में मदद करता है, जिससे अतिरिक्त रसायनों के इस्तेमाल की आवश्यकता काफी हद तक कम हो जाती है। पानी और सॉल्वेंट को मिलाने की समयावधि का भी रिकवरी पर गहरा असर पड़ता है, और तय समय तक संपर्क कराने से बेहतर परिणाम मिलते हैं। लिथियम को पूरी तरह अलग करने के लिए तनु नाइट्रिक एसिड का प्रयोग किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को पांच बार दोहराने पर वैज्ञानिकों को करीब 90 प्रतिशत तक लिथियम रिकवरी हासिल हुई। इसके बाद सॉल्वेंट को दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सकता है, हालांकि हर चक्र में लगभग 10 प्रतिशत सॉल्वेंट कम हो जाता है, जिसका औद्योगिक स्तर पर लागत पर असर पड़ सकता है।

​सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में लिथियम और इससे जुड़े उत्पादों के आयात में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2018 में जहां देश का लिथियम आयात महज 3,532 करोड़ रुपये के आसपास था, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह आंकड़ा उछलकर 25,458.6 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके बाद, वित्त वर्ष 2026 के शुरुआती 11 महीनों यानी अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच यह आयात बढ़कर सीधे 37,624.6 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर को छू गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में लगभग 48 प्रतिशत अधिक है। वर्तमान में भारत रिफाइंड लिथियम और बैटरी-ग्रेड सेल के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर है, जिसमें चीन की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है।

​यदि BARC द्वारा विकसित इस नई तकनीक का उपयोग बड़े और व्यावसायिक पैमाने पर सफलतापूर्वक किया जा सके, तो देश के भीतर ही लिथियम का मजबूत घरेलू विकल्प तैयार होने का रास्ता साफ हो जाएगा। इससे विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता घटेगी और घरेलू ईवी इंडस्ट्री को बड़ा संबल मिलेगा। हालांकि, जानकारों का मानना है कि समुद्र के पानी में लिथियम की मूल मात्रा काफी कम होती है, इसलिए केवल 90 प्रतिशत रिकवरी हासिल कर लेना ही काफी नहीं है। इसके लिए यह भी आंकलन करना होगा कि एक निश्चित मात्रा में लिथियम हासिल करने के लिए कितने समुद्री पानी, ऊर्जा और रसायनों की खपत होगी। लैब स्तर की इस तकनीक को बड़े इंडस्ट्रियल सेटअप तक ले जाने में आने वाली लागत और इसके पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन करना भी आने वाले समय में बेहद जरूरी होगा।