उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे संतोष कुमार राय की समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं. इस चर्चित मामले में पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि समेत पांच लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.
लखनऊ. उत्तर प्रदेश के चर्चित मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में करीब 23 साल बाद एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को इस मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी संतोष कुमार राय की समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं. अदालत ने कहा है कि रिहाई से संबंधित आवश्यक दस्तावेज जेल प्रशासन को मिलते ही आगे की कार्रवाई पूरी की जाए.
उत्तराखंड सरकार की समयपूर्व रिहाई नीति के तहत लंबे समय से जेल में बंद पात्र कैदियों के मामलों पर विचार किया जा रहा है. अदालत में बताया गया कि 14 साल या उससे अधिक की सजा पूरी कर चुके पात्र बंदियों की रिहाई के लिए कार्रवाई की जानी है. इसी प्रक्रिया के तहत संतोष कुमार राय को भी राहत मिली है.
इस आदेश के बाद उस हत्याकांड की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है, जिसने दो दशक से अधिक समय पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी थी. इस मामले में तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी, उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी समेत पांच लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.
9 मई 2003 को हुई हत्या
लखनऊ के निशातगंज स्थित पेपर मिल कॉलोनी में 9 मई 2003 को कवयित्री मधुमिता शुक्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. घटना के समय वह अपने आवास पर थीं. दोपहर करीब 3:15 बजे हमलावर घर में दाखिल हुए और उन्हें गोली मार दी, जिससे उनकी मौत हो गई.
हत्या के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की. मधुमिता की बहन निधि शुक्ला ने तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि पर गंभीर आरोप लगाए. मामले में एक प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति का नाम सामने आने के बाद इसकी जांच और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे.
उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली सरकार थी. अमरमणि त्रिपाठी ने शुरुआत में अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज किया था, जबकि मधुमिता के परिवार ने निष्पक्ष जांच की मांग की थी.
पुलिस से सीबीआई तक जांच
मधुमिता की हत्या के बाद शुरुआती जांच लखनऊ पुलिस ने की थी. बाद में 17 मई 2003 को मामले की जांच क्राइम ब्रांच सीआईडी को सौंप दी गई. जून 2003 में इसकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को दे दी गई.
सीबीआई ने जांच के दौरान गवाहों के बयान दर्ज किए और कॉल डिटेल, मोबाइल फोन से जुड़े साक्ष्यों समेत अन्य सबूतों की पड़ताल की. इसी दौरान मधुमिता के गर्भवती होने की जानकारी सामने आई, जिसने जांच को एक महत्वपूर्ण दिशा दी.
डीएनए रिपोर्ट से आया मोड़
मधुमिता के पोस्टमार्टम में उनके गर्भवती होने की पुष्टि हुई थी. इसके बाद गर्भस्थ शिशु के पिता की पहचान को लेकर जांच आगे बढ़ी. निधि शुक्ला की ओर से लगाए गए आरोपों के बाद गर्भस्थ शिशु का डीएनए परीक्षण कराया गया.
जांच रिपोर्ट में गर्भस्थ शिशु का डीएनए अमरमणि त्रिपाठी के नमूने से मेल खाने की बात सामने आई. इसके बाद अमरमणि को 23 सितंबर 2003 को गिरफ्तार कर लिया गया.

जांच के दौरान मधुमिता पर गर्भपात कराने का दबाव बनाए जाने का आरोप भी सामने आया था. बताया गया कि वह इसके लिए तैयार नहीं थीं. सीबीआई ने अपनी जांच में इस विवाद और हत्या की साजिश के आरोपों के बीच संबंधों की पड़ताल की.
19 दिसंबर 2003 को सीबीआई ने छह लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. इनमें अमरमणि त्रिपाठी, मधुमणि त्रिपाठी, रोहित चतुर्वेदी, संतोष कुमार राय, प्रकाश चंद्र पांडे और पुलिस इंस्पेक्टर यज्ञ नारायण दीक्षित शामिल थे. मुकदमे की सुनवाई के दौरान यज्ञ नारायण दीक्षित की मृत्यु हो गई.
कवि सम्मेलन से बढ़ीं नजदीकियां
मधुमिता शुक्ला मूल रूप से लखीमपुर खीरी की रहने वाली थीं. वह कवयित्री थीं और अपनी रचनाओं के जरिए साहित्यिक पहचान बना रही थीं. उनकी बहन निधि शुक्ला के अनुसार, वर्ष 1999 के आसपास दिल्ली में एक कवि सम्मेलन के दौरान उनकी मुलाकात अमरमणि त्रिपाठी के परिवार से हुई थी.
मीडिया रिपोर्टों और परिवार के बयानों के मुताबिक, अमरमणि की मां सावित्री मणि और परिवार के अन्य सदस्य मधुमिता की कविताएं पसंद करते थे. इसी वजह से उनका परिवार के घर आना-जाना शुरू हुआ. बाद में उनकी मुलाकात अमरमणि त्रिपाठी से हुई.
उस समय अमरमणि पूर्वांचल की राजनीति में प्रभावशाली नेता थे. बताया जाता है कि उन्होंने मधुमिता से अपने राजनीतिक भाषण लिखने में मदद मांगी थी. इसी सिलसिले में दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और धीरे-धीरे नजदीकियां हो गईं.
अमरमणि पहले से शादीशुदा थे और उनके दो बच्चे भी थे. दोनों के संबंधों को लेकर परिवार में तनाव की बात भी सामने आई थी. हत्या के बाद निधि शुक्ला ने अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि पर गंभीर आरोप लगाए थे.
35 पन्नों की डायरी
इस हत्याकांड की जांच के दौरान मधुमिता की एक निजी डायरी का भी उल्लेख हुआ था. बताया गया कि करीब 35 पन्नों की इस डायरी में उन्होंने अपने निजी जीवन और अमरमणि त्रिपाठी के साथ संबंधों से जुड़ी बातें दर्ज की थीं.
निधि शुक्ला के मुताबिक, डायरी में अमरमणि के लिए ‘विक्टर’ और उनकी पत्नी मधुमणि के लिए ‘एम’ नाम का इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, डायरी में दर्ज बातों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं.
मुकदमा देहरादून स्थानांतरित
मधुमिता के परिवार को आशंका थी कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक प्रभाव के चलते मुकदमे की सुनवाई प्रभावित हो सकती है. इसी आधार पर मामले को दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी.
इससे पहले अमरमणि त्रिपाठी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से जमानत मिल गई थी. सीबीआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 26 सितंबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने अमरमणि की जमानत रद्द करते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया.
इसके बाद 8 फरवरी 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने मधुमिता हत्याकांड का मुकदमा उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड के देहरादून स्थानांतरित कर दिया. वहां विशेष अदालत में सुनवाई शुरू हुई. मुकदमे के दौरान करीब 79 गवाहों के बयान दर्ज किए गए.
2007 में चार को उम्रकैद
24 अक्टूबर 2007 को देहरादून की अदालत ने अमरमणि त्रिपाठी, मधुमणि त्रिपाठी, रोहित चतुर्वेदी और संतोष कुमार राय को हत्या और साजिश के मामले में दोषी ठहराया. अदालत ने चारों को उम्रकैद की सजा सुनाई.
वहीं, प्रकाश चंद्र पांडे को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के आधार पर निचली अदालत ने बरी कर दिया था. हालांकि, सीबीआई ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा.
16 जुलाई 2012 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अमरमणि, मधुमणि, रोहित चतुर्वेदी और संतोष कुमार राय की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी. इसी सुनवाई में हाईकोर्ट ने प्रकाश चंद्र पांडे को भी दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. इस तरह हत्याकांड में कुल पांच लोगों को उम्रकैद मिली. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषियों की सजा के खिलाफ दाखिल अपीलों में राहत नहीं दी और उनकी दोषसिद्धि बरकरार रही.
2023 में अमरमणि दंपती रिहा
करीब 16 साल जेल में रहने के बाद अगस्त 2023 में अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी की समयपूर्व रिहाई का आदेश जारी किया गया. उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी 2018 की सजा माफी नीति के तहत यह फैसला लिया था. आदेश में दोनों की उम्र और जेल में अच्छे आचरण को भी आधार बनाया गया था.
25 अगस्त 2023 को दोनों जेल से बाहर आ गए. उनकी रिहाई के खिलाफ मधुमिता की बहन निधि शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. 25 अगस्त 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.
इसके बाद मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अमरमणि और मधुमणि की समयपूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली निधि शुक्ला की याचिका खारिज कर दी. अदालत ने उन्हें संबंधित हाईकोर्ट जाने को कहा.
अब 30 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इसी हत्याकांड में दोषी संतोष कुमार राय की समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं. इस आदेश के बाद मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक और दोषी की जेल से रिहाई का रास्ता खुल गया है.

