(सुधीर दंडोतिया की कलम से)

AICC को भेजा 100 करोड़ से ज्यादा का बिल

चुनाव में बुरी हार पर कांग्रेस आत्ममंथन करने में जुटी हुई है लेकिन उधर एमपी कांग्रेस की तरफ से AICC को 100 करोड़ से ज्यादा का चुनावी खर्च का बिल भेजा गया है और इसमें वो खर्च भी जोड़ा गया है जिसमें पीसीसी चीफ कमलनाथ के साथ राहुल गांधी ने अलग-अलग जगह पर दौरे किए हैं…अब आलाकमान समझ नहीं पा रहा है कि इन बिल का क्या किया जाए, क्योंकि नेताजी तो दिल्ली बैठक में ये दम भरते थे की मैं चुनाव में खर्च भी करूंगा और जीत भी दिलाऊंगा लेकिन हार के बाद तो तस्वीर पूरी तरीके से बदल गई।

जब बड़े साहब तक पहुंच गए ठेकेदार

लंबे समय तक चली बारिश के बाद आए चुनाव के बीच सड़कें दुरुस्त करने के खूब फरमान जारी हुए. लिहाजा प्रदेशभर में सड़कों की मरम्मत के साथ उखड़ी सड़कें थोक में बनाई गईं. पूर्व से स्वीकृत सड़क बनाने का काम आचार संहिता के बीच भी जोर-शोर से चलता रहा. लोक निर्माण विभाग की सड़कें बनाने का काम भी धड़ाधड़ चला, लेकिन जिस तेजी से सड़कें बनीं ठेकेदारों को पेमेंट करने में उतनी ही अधिक मंदी रही. ठेकेदारों ने कुछ दिन तो इंतजार किया लेकिन कोई हल निकलता नहीं देख ठेकेदार ग्रुप बनाकर मंत्रालय की सीढियां चढ़ बैठे और बड़े साहब के सामने शिकायतों की झड़ी लगा दी.

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तीन बार चला नाम अब बन सकते हैं प्रशासनिक मुखिया

प्रदेश को नई सरकार और नए मुख्यमंत्री मिलने के बाद अब प्रशासनिक महकमे में यही चर्चा आम है कि प्रदेश का नया प्रशासनिक मुखिया कौन होगा. इन चर्चाओं के बीच केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जमे वरिष्ठ अफसर का नाम खूब जोर-शोर से लिया जा रहा है. मंत्रालय के कई अफसर तो दावा कर रहे हैं कि वही साहब अब मध्य प्रदेश के नए मुख्य सचिव होंगे. आपको बता दें मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के रिटायरमेंट के दौरान सालभर पहले दिल्ली वाले साहब का नाम खूब चला था. लेकिन इकबाल सिंह बैंस को छह महीने का एक्सटेंशन मिल गया था. छह महीने बाद फिर दिल्ली वाले साहब का नाम चला लेकिन मुख्य सचिव का कार्यकाल छह महीने फिर बढ़ गया. मुख्य सचिव की विदाई के दौरान भी साहब का नाम चला. लेकिन निर्वाचन आयोग ने मध्य प्रदेश में मौजूद सबसे सीनियर आईएएस वीरा राणा को मुख्य सचिव की जिम्मेदारी सौंप दी थी.

हार देख दिग्गज नेता लेने वाले थे संन्यास

बात ग्वालियर-चंबल इलाके के कांग्रेस के दिग्गज नेता की है. बड़ी जिम्मेदारी संभाले बैठे नेताजी पहले तो चुनाव लड़ने के इच्छुक ही नहीं थे. लेकिन सरकार बनने की आस में आखिरी दौर में चुनावी समर में कूद ही गए. क्योंकि सरकार में फिर बड़ा पद मिलना सुनिश्चित ही था. अब नजीते आए तो पार्टी के साथ खुद नेताजी भी चुनाव हार गए. इससे दुखी नेताजी ने राजनैतिक संन्यास लेने का मन बना लिया. चर्चा कार्यकर्ताओं के साथ दूर तक फैल गई. कार्यकर्ताओं ने तो अपने नेता को रोका ही साथ ही पार्टी के बड़े नेताओं ने भी अनुरोध किया कि फिलहाल पार्टी को आपकी जरूरत है. खुद के लिए नहीं कम से कम पार्टी के लिए तो आपको ये कदम रोकना ही होगा. नेताजी ने अपनी पार्टी के नेताओं की बात मानी और राजनैतिक संन्यास का विचार टाल दिया.

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हाईकमान से आया फरमान मीडिया से बनाओ दूरी

मध्य प्रदेश में करारी हार के बाद वैसे तो प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल के नेता कम ही बयानबाजी कर रहे थे. लेकिन इस बीच हाईकमान से आए फरमान के बाद कुछ दिनों तक प्रमुख विषयों को लेकर प्रवक्तागणों को मीडिया से दूरी बनाए रखने के निर्देश जारी हुए. पार्टी से सीधे जुड़े प्रवक्ताओं ने इसका बाखूबी पालन भी किया, लेकिन दूसरे नेता मीडिया में पार्टी का पक्ष रखते रहे. खबर है कि पार्टी के मीडिया विभाग को अब फिर राहत मिलने जा रही है, लेकिन इस निर्देश के साथ कि बहुत ही सोच समझकर और संयमित बोलना है.

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