भोपाल। मध्य प्रदेश ने अपनी स्थापना के 70 साल पूरे कर लिए हैं। इन सात दशकों की इस लंबी और उतार-चढ़ाव भरी यात्रा में मध्य प्रदेश ने न केवल राजनीति की तमाम उठापटक देखी है, बल्कि लगभग हर मोर्चे पर खुद को साबित करके दिखाया है। आज देश के सबसे साफ-सुथरे शहरों की लिस्ट में लगातार वर्षों से मध्य प्रदेश के ही इंदौर शहर का दबदबा कायम है। 

हालांकि, भोपाल गैस त्रासदी जैसी कुछ गंभीर घटनाओं ने राज्य के इतिहास पर अमानवीय दाग भी छोड़े, लेकिन बदलते वक्त के साथ मध्य प्रदेश ने अपनी मेहनत और मजबूत इच्छाशक्ति से एक नई इबारत लिखी है। एक वक्त ऐसा भी था, जब मध्य प्रदेश की राजधानी को चुनने के लिए तीखा विवाद हुआ था और जब भोपाल को राजधानी बनाया गया, तो इसके विरोध में जबलपुर के लोगों ने दीवाली ही नहीं मनाई थी। मध्य प्रदेश के गठन और उसके इतिहास से जुड़े ऐसे कई अजब-गजब और रोचक किस्से आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।

मध्य प्रदेश का नक्शा देखकर चौंके थे पंडित नेहरू

स्वतंत्रता के बाद जब 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ, तो राज्यों के पुनर्गठन को लेकर सियासी खींचतान शुरू हो गई थी। एक वर्ग भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के पक्ष में था, तो दूसरा वर्ग इसके विरोध में था कि इससे भेदभाव बढ़ेगा। आखिरकार, भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग अस्तित्व में आया। तत्कालीन मध्य प्रांत, मध्यभारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल रियासत को मिलाकर वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य के गठन की रूपरेखा तैयार की गई। 10 अक्टूबर 1955 को जब राज्य पुनर्गठन आयोग ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने अपनी रिपोर्ट पेश की, तो उसमें मध्य प्रदेश के गठन का प्रस्ताव भी शामिल था। लेकिन जैसे ही नेहरू ने नए मध्य प्रदेश के नक्शे को देखा, वे चौंक उठे। उन्होंने तपाक से टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘अरे! यह क्या अजूबा है। ऐसा लंबा-चौड़ा और बेढंगा प्रदेश कैसे बन सकता है?’ उस दौरान कई बड़े नेता मध्य प्रदेश के गठन के पक्ष में नहीं थे, और नेहरू के इस रिएक्शन से उन्हें अपनी उम्मीदें भी जगती हुई नजर आई थीं। हालांकि, तमाम राजनीतिक विरोधों को दरकिनार करते हुए आखिरकार 1 नवंबर 1956 को नए मध्य प्रदेश का आधिकारिक रूप से गठन हो गया।

शपथ के बाद हाथ मिलाने की जगह शुरू हुई नमस्कार की परंपरा

नवगठित मध्य प्रदेश की विधानसभा का पहला सत्र 17 दिसंबर 1956 को शुरू हुआ था। इस पहली विधानसभा में कुल 328 सदस्य शामिल थे, जिनमें 12 महिला विधायक भी थीं। इन सदस्यों में मध्यप्रांत के 150, मध्यभारत के 88, विंध्यप्रदेश के 60 और भोपाल रियासत के 30 सदस्य शामिल थे। जब इन सदस्यों को नई विधानसभा में शपथ दिलाई जा रही थी, तो कई लोगों ने इसका विरोध भी किया था। उनका मुख्य तर्क यह था कि जब सदस्य अपने मूल क्षेत्रों में पहले ही शपथ ले चुके हैं, तो उन्हें दोबारा शपथ दिलाने का क्या औचित्य बनता है? उस दौर में यह परंपरा थी कि शपथ ग्रहण के बाद सदस्य सभापति से हाथ मिलाते थे। लेकिन विधायक हीरालाल शर्मा ने इस नियम पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि हाथ मिलाना अंग्रेजी सभ्यता का प्रतीक है और इसमें अनावश्यक रूप से समय भी व्यर्थ होता है। माना जाता है कि इसी घटना के बाद से विधानसभा में सदस्यों द्वारा शपथ लेने के बाद सभापति को हाथ जोड़ने यानी नमस्कार करने की एक नई और अनूठी परंपरा की शुरुआत हुई।

राजधानी की रेस और जबलपुर के विरोध में न मनाने का फैसला

कई अलग-अलग अंचलों और रियासतों को मिलाकर मध्य प्रदेश का गठन तो कर दिया गया था, लेकिन अब सबसे बड़ा सिरदर्द यह था कि इसकी राजधानी किसे बनाया जाए। दावेदारों की लंबी फेरिस्त थी, लेकिन मुहर किसी एक पर ही लगनी थी। ग्वालियर और इंदौर ने सबसे पहले राजधानी के लिए अपना दावा ठोक दिया था। इसके अलावा, रायपुर और ऐतिहासिक शहर जबलपुर ने भी अपनी दावेदारी मजबूत रखी थी। दिलचस्प बात यह है कि राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में जबलपुर को ही राजधानी बनाने का प्रस्ताव दिया था। ऐसे में जबलपुर का नाम लगभग तय माना जा रहा था। लेकिन तभी अचानक राजनीतिक पासा पलट गया। उन दिनों कुछ अखबारों में यह खबर छप गई कि सेठ गोविंद दास के परिवार ने जबलपुर-नागपुर रोड पर भारी मात्रा में कई एकड़ जमीन खरीद ली है, ताकि जबलपुर के राजधानी बनने के बाद उन्हें इसका भारी-भरकम मुआवजा मिल सके। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद जबलपुर को रेस से तुरंत बाहर कर दिया गया और अचानक भोपाल का नाम सामने आ गया, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी काफी पसंद था।

नेहरू की भोपाल से ‘मोहब्बत’ और भोपाल रियासत का विलय

कहते हैं कि मध्य प्रदेश के गठन से पहले ही भोपाल राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पूरी तरह अपने पाले में कर लिया था। नेहरू भोपाल के ऐसे दीवाने थे कि वे साल में कम से कम दो बार भोपाल का दौरा जरूर करते थे। केवल वर्ष 1956 तक ही नेहरू बतौर प्रधानमंत्री 18 बार भोपाल आ चुके थे। भोपाल में स्थापित होने वाला ट्रैक्टर टेस्टिंग संस्थान, पॉलिटेक्निक और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज इसी आत्मीयता और जुड़ाव की बड़ी देन माने जाते हैं। जबलपुर को नजरअंदाज करने और भोपाल को राजधानी बनाने के पीछे कई जानकार अलग-अलग वजहें भी गिनाते हैं। कुछ का मानना है कि विंध्य क्षेत्र समाजवादी आंदोलन का एक बड़ा गढ़ था, और यदि जबलपुर राजधानी बन जाता तो विंध्य प्रदेश राज्य की मुख्य राजनीति का केंद्र बन जाता। इसके अलावा, एक तर्क यह भी दिया गया कि जबलपुर में सरकारी इमारतें और कार्यालय खड़े करने के लिए पर्याप्त खाली जगह उपलब्ध नहीं थी, जबकि भोपाल नवाबों और विशाल महलों वाला शहर था। भोपाल में प्रचुर मात्रा में खाली जमीन थी, जहां आसानी से सरकारी दफ्तर बनाए जा सकते थे। बाद में भोपाल के इन्हीं ऐतिहासिक महलों को सरकारी कार्यालयों के रूप में इस्तेमाल भी किया गया।

सरदार पटेल की रणनीति और जबलपुर का अनोखा विरोध

भोपाल को राजधानी बनाए जाने के पीछे देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की एक दूरदर्शी रणनीति भी जुड़ी हुई थी। कहा जाता है कि भोपाल के तत्कालीन नवाब हमीदुल्लाह खान शुरू में हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर भारत विरोधी गतिविधियों और साजिशों में संलिप्त हो गए थे। सरदार पटेल कतई नहीं चाहते थे कि देश के ठीक मध्य भाग में इस तरह की राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का कोई भी केंद्र पनपे। ऐसे में, भोपाल पर कड़ी नजर रखने और उस क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित करने के उद्देश्य से इसे मध्य प्रदेश की राजधानी बनाने का कड़ा निर्णय लिया गया। इस पूरे प्रशासनिक फैसले में मौलाना अबुल कलाम आजाद का भी मजबूत समर्थन प्राप्त था। बहरहाल, जब भोपाल को राजधानी घोषित कर दिया गया, तो जबलपुर से एक नाराज प्रतिनिधिमंडल अपनी बात मनवाने के लिए दिल्ली पहुंचा और जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, लालबहादुर शास्त्री व गोविंदवल्लभ पंत से मुलाकात की, लेकिन उन्हें अंततः मायूस होकर ही लौटना पड़ा। इस फैसले से उपजे भारी आक्रोश के चलते उस वर्ष पूरे जबलपुर शहर ने दीवाली का त्योहार ही नहीं मनाया था।

जिला बनने का सफर और ‘ग से गधा’ पढ़ाने का किस्सा

जब भोपाल को नए राज्य की राजधानी बनाया गया, तब वहां की कुल आबादी महज 50 हजार के आसपास थी, जिसमें भी एक बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यक वर्ग का था। भोपाल कागजों पर और हकीकत में राज्य की राजधानी तो बन चुका था, लेकिन प्रशासनिक रूप से वह सीहोर जिले का ही एक हिस्सा हुआ करता था। राजधानी घोषित होने के पूरे 16 साल बाद, वर्ष 1972 में जाकर भोपाल को एक स्वतंत्र और अलग जिले का दर्जा दिया गया। मुख्यमंत्री आवास के लिए उस समय तत्कालीन आईजी एसएन आगा के बंगले को चुना गया था, जिसे आज एक वीआईपी गेस्ट हाउस के रूप में जाना जाता है।

इसके अलावा, मध्य प्रदेश के गठन से पहले भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके डॉ. शंकरदयाल शर्मा को नए राज्य के गठन के बाद राज्य का शिक्षा मंत्री बना दिया गया था। डॉ. शर्मा धर्मनिरपेक्षता के अत्यंत कट्टर और पक्के पैरोकार माने जाते थे। उनके इसी वैचारिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण का असर राज्य की स्कूली शिक्षा प्रणाली पर भी साफ देखने को मिला। उन दिनों ककहरा पढ़ाते वक्त ‘ग से गणेश’ पढ़ाने की परंपरा हुआ करती थी, लेकिन डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने इस परंपरा को बदलवाते हुए इसे ‘ग से गधा’ पढ़वाए जाने के निर्देश जारी करवा दिए थे, जो उस दौर का एक बड़ा और चर्चित प्रशासनिक व शैक्षणिक बदलाव साबित हुआ था।

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