उमेश यादव, सागर। मलूक पीठाधीश्वर एवं अग्रपीठाधीश्वर स्वामी डॉ. राजेंद्र दास देवाचार्य महाराज के एक दिवसीय प्रवास को लेकर सुबह से ही श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई दिया। ग्राम सानोंधा से शुरू हुआ उनका स्वागत शहर के प्रमुख मार्गों तक चलता रहा। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर गुरुदेव की अगवानी की, आरती उतारी और आशीर्वाद प्राप्त किया। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में भक्त शामिल रहे, जिससे कई स्थानों पर आस्था का जनसैलाब नजर आया, आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने संतों का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। अजब श्री सेवा समिति, अजब धाम एवं मलूक पीठ परिवार, जिला दमोह और सागर के तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में महंत श्री राम अनुग्रह दास महाराज (छोटे सरकार) का भी भक्तों को सानिध्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर 200 से अधिक श्रद्धालुओं ने गुरु दीक्षा ग्रहण कर आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का संकल्प लिया।

गौ महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला

तिली रोड स्थित रॉयल पैलेस होटल के सभागार में आयोजित धर्मसभा में संत राजेंद्र दास ने गौ महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यज्ञ की वास्तविक अधिकारी गाय है और गौ व गव्य पदार्थों के बिना वैदिक परंपरा की कल्पना भी संभव नहीं है।उन्होंने कहा कि शासन की नीयत पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने सनातन हिंदू समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है तो उसे कठोर दंड मिलना चाहिए।उन्होंने कहा कि वर्तमान में जिस विषय की जांच चल रही है, उस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कठोर एवं निष्पक्ष निर्णयों के लिए जाने जाते हैं।

समाज को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता

उन्होंने कहा कि प्रतिकूल घटनाएं समाज को आत्ममंथन और सुधार का अवसर देती हैं। कलियुग में धन और स्वार्थ के कारण लोगों की नीयत बदल सकती है, इसलिए धार्मिक और आस्तिक समाज को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। मूर्ति और प्रतीक चिन्हों के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि वैदिक परंपरा में केवल प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह को ही मूर्ति माना जाता है। जबकि महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, महारानी लक्ष्मीबाई और अन्य महापुरुषों की प्रतिमाएं प्रेरणा के प्रतीक हैं। इनका उद्देश्य समाज, विशेषकर युवाओं को अपने गौरवशाली इतिहास और आदर्शों से जोड़ना है।

धर्म से रहित राजनीति कभी जनकल्याणकारी नहीं

उन्होंने कहा कि धर्म से रहित राजनीति कभी जनकल्याणकारी नहीं हो सकती। यदि राजनीति में संस्कार और धर्म का आधार नहीं होगा तो वह रावण और कंस जैसी व्यवस्था का रूप ले लेगी। रामराज्य की स्थापना के लिए धर्म और नैतिक मूल्यों का समावेश आवश्यक है। मंदिरों में आने वाले चढ़ावे के उपयोग पर कहा कि इस धन का अधिक से अधिक उपयोग निराश्रित गोवंश की सेवा, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और जनकल्याण के कार्यों में होना चाहिए। मंदिरों में अनावश्यक खर्च कम कर गरीब श्रद्धालुओं के लिए सुलभआवास और सात्विक प्रसाद की व्यवस्था की जानी चाहिए।

युवाओं को समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देना चाहिए

युवाओं को संदेश दिया कि बदलते समय में केवल नौकरी पर निर्भर रहने की सोच पर्याप्त नहीं है। भगवान श्रीराम ने अपने पुरुषार्थ, कौशल और संकल्प के बल पर असुरों का नाश किया था। आज के युवाओं को भी अपने कौशल, श्रम और आत्मविश्वास के बल पर परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देना चाहिए। ज्ञान और विज्ञान के बीच के भ्रम को स्पष्ट करते हुए बताया कि शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान परोक्ष है। जबकि आंखों से प्रत्यक्ष देखा जाने वाला अनुभव विज्ञान है।

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