अभय मिश्रा, मऊगंज। बहुचर्चित भाटी जंगल दोहरे हत्याकांड में पुलिस और एसआईटी की कार्यप्रणाली पर न्यायालय ने एक ऐसा करारा तमाचा जड़ा है। जिसने पुलिस के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। जिस अंधे कत्ल के खुलासे का ढोल तत्कालीन थाना प्रभारी राजेश पटेल और एसआईटी की टीम पीट रही थी। अदालत के फैसले ने उस पूरी कहानी को कागजी और झूठा साबित कर दिया है। गिरफ्तारी, जब्ती, मेडिकल और मेमोरेंडम के समय में ऐसा गजब का झोल मिला कि अदालत को दोनों आरोपियों को बरी करना पड़ा। बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इन तमाम विसंगतियों को अदालत के सामने बेनकाब किया।

मऊगंज जिले का भाटी जंगल… जहां 25 और 26 दिसंबर 2024 की दरमियानी रात मंगल यादव और उसकी 80 वर्षीय पत्नी तेरसी यादव के साथ बालात्कार कर निर्मम हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने दावा किया था कि उसने ‘अंधी हत्या’ का पर्दाफाश कर दिया है और श्रीनिवास पाल तथा साकिर अहमद को सलाखों के पीछे भेज दिया है।

तत्कालीन एसपी द्वारा गठित एसआईटी में सम्मिलित तत्कालीन एसडीओपी अंकिता शूल्या ,तत्कालीन थाना प्रभारी राजेश पटेल,भैया मान सिंह , इस के द्विवेदी ,जगदीश सिंह ठाकुर सहित अन्य पुलिस कर्मियों की स्पेशल निगरानी में जांच हुई थी, लेकिन जब कोर्ट ने दस्तावेजों की परतें उधेड़ीं, तो पुलिस का पूरा फर्जीवाड़ा सामने आ गया और दोनों आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।

इस केस की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जिस हंसिया और काली चप्पल, दारू की बोतल, मछली के जाल को घटना के ठीक दूसरे दिन यानी 27 दिसंबर 2024 की सुबह 8:35 बजे डॉग स्क्वॉड को सूंघाया गया था और जिसे विवेचक भैया मान सिंह पहले ही घटनास्थल से उठा चुके थे और थाना प्रभारी को सौंप चुके थे। लेकिन बाद में वही हंसिया आरोपी साकिर अहमद के कब्जे से बरामद दिखाई गई। जो हथियार पहले से पुलिस के कब्जे में था, उसे बाद में जब्ती में दिखाना पुलिस की थ्योरी पर सीधा सवाल खड़ा करता है।

पुलिस के द्वारा श्रीनिवास पाल से जब्ती: दोपहर 16:20 बजे दिखाई गई जबकि श्रीनिवास पाल की गिरफ्तारी ठीक 5 मिनट बाद यानी दोपहर 16:25 बजे दर्शाई गई है। इसी तरह साकिर अहमद से  जब्ती दोपहर 16:38 बजे दिखाई गई। जबकि साकिर अहमद की गिरफ्तारी दोपहर 16:45 बजे दर्शाई गई है ठीक 7 मिनट के बाद।

इसके बाद जब बिना देर किए इन दोनों आरोपियों को शाम को ठीक लगभग 17:00 बजे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया। तब उसके बाद पुलिस के द्वारा दोनों आरोपी श्रीनिवास से रात 22:10 बजे और साकिर का रात 23:30 बजे! मेमोरंडम कथन कैसे लिए गए ,जब दोनों आरोपी शाम 5 बजे ही जेल भेजे जा चुके थे,

तारीखों और मेडिकल का खेल भी हैरान करने वाला है। आरोपी श्रीनिवास पाल की गिरफ्तारी पुलिस रिकॉर्ड में 31 दिसंबर 2024 को दर्शाई गई, लेकिन मजे की बात यह है कि उसका मेडिकल परीक्षण उससे एक दिन पहले यानी *30 दिसंबर 2024 को सुबह 7:18 बजे ही कराया जा चुका था! वहीं, दूसरे आरोपी साकिर अहमद का तो मेडिकल परीक्षण कराया ही नहीं गया।

इस पूरे मामले में आरोपियों की ओर से सक्षम पैरवी अधिवक्ता प्रदीप मिश्रा और ममनून सिद्दीकी ने की। उन्होंने अदालत के सामने इन सभी समयात्मक विसंगतियों, फर्जी मेमोरेंडम और साक्ष्यों की अनदेखी को जोरदार तरीके से रखा। जिसके बाद न्यायालय के द्वारा दोनोंरोपियो को बरी कर दिया गया!अब सवाल यह उठता है कि तत्कालीन एसडीओपी की निगरानी में बनी एसआईटी आखिर क्या कर रही थी? आखिर एस आईटी ने क्या जांच किया ,क्या अब पुलिस के ऊपर न्यायालय के द्वारा की गई सख्त टिप्पणियों के बाद कोई कार्यवाही होगी ? क्या अब भी बुजुर्ग दम्पतियों की हत्या के असली गुनाहगार को पुलिस पकड़ पाएगी ,या  इस दोहरी हत्या की गुत्थी कागजों में उलझ कर रह जायेगी।

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