मौलाना साजिद रशीदी के एक बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष ने मुस्लिम और हिंदू परिवारों में बच्चों की संख्या के साथ-साथ माता-पिता की देखभाल को लेकर तुलना की। उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम परिवार अपने बुजुर्ग माता-पिता को वृद्धाश्रम में नहीं छोड़ते, जबकि दिल्ली के वृद्धाश्रमों में हिंदू परिवारों के बुजुर्ग ज्यादा हैं।
रशीदी ने अपने बयान में मुस्लिम परिवारों में बच्चों की संख्या का जिक्र करते हुए कहा कि पांच से अधिक बच्चे होना सामान्य बात है और छह बच्चों की संख्या को उन्होंने ‘लास्ट आंकड़ा’ बताया। उन्होंने कहा कि कुछ परिवारों में बच्चों की संख्या आठ, दस या 11-12 तक भी होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने हिंदू परिवारों से कम बच्चे होने को लेकर सवाल करते हुए कम से कम 10 बच्चों की बात कही।
उन्होंने बच्चों की परवरिश और परिवार की जिम्मेदारी को लेकर भी अपनी राय रखी। रशीदी के मुताबिक मुस्लिम समुदाय में यह धारणा है कि बच्चों का पालन-पोषण ऊपर वाला करता है और माता-पिता केवल माध्यम होते हैं। वहीं उन्होंने हिंदू परिवारों में बच्चों की पढ़ाई, परवरिश और खर्च को लेकर होने वाली चिंताओं का जिक्र किया।
बयान के दौरान उन्होंने कामकाजी माता-पिता और बच्चों की देखभाल का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि कई हिंदू परिवारों में माता-पिता नौकरी के लिए बाहर जाते हैं और बच्चों की देखभाल नैनी के जिम्मे रहती है। रशीदी ने इसे बच्चों के संस्कार और परिवार से जुड़ाव से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।
वृद्धाश्रमों को लेकर रशीदी ने कहा कि पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ बच्चे अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं और अपनी पत्नी के साथ रहने लगते हैं। इसी तुलना के आधार पर उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम परिवारों में ऐसा नहीं होता। दिल्ली के वृद्धाश्रमों में हिंदू बुजुर्गों की मौजूदगी को लेकर किया गया उनका दावा भी उनके बयान का प्रमुख हिस्सा रहा।
रशीदी के इस बयान में जनसंख्या, परिवार, बच्चों की परवरिश और बुजुर्गों की देखभाल जैसे संवेदनशील मुद्दे एक साथ सामने आए हैं। खास तौर पर हिंदू और मुस्लिम परिवारों की तुलना किए जाने के कारण बयान विवाद का विषय बन गया है।
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