मेरठ. देशभर में दशहरे पर रावण दहन और आतिशबाजी की जाती है. लेकिन मेरठ के गगोल गांव में यह दिन शोक के रूप में मनाया जाता है. शहर से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव के ज्यादातर घरों में दशहरा नहीं मनाया जाता. ग्रामीणों के मुताबिक, कई घरों में इस दिन चूल्हे भी नहीं जलते. इसकी वजह 1857 की क्रांति से जुड़ी एक घटना है.

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दशहरे के दिन नौ क्रांतिकारियों को दी गई थी फांसी

ग्रामीणों के अनुसार, 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने गगोल गांव के नौ क्रांतिकारियों को दशहरे के दिन फांसी दी थी. तभी से गांव में इस दिन उत्सव मनाने के बजाय शहीदों को याद करने की परंपरा चली आ रही है. ग्रामीण इस घटना को अपने पूर्वजों के बलिदान से जोड़कर देखते हैं.

पीपल के पेड़ से जुड़ी है शहादत की कहानी

गांव के बाहर मौजूद एक विशाल पीपल के पेड़ को लेकर मान्यता है कि अंग्रेजों ने इसी पेड़ पर नौ क्रांतिकारियों को फांसी दी थी. पेड़ के नीचे उनकी स्मृति से जुड़ी समाधि भी बनी हुई है. ग्रामीणों के मुताबिक, शहीदों में रम्मन सिंह, राम सहाय, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, शिब्बा सिंह, कढ़ेरा सिंह, घसीटा सिंह, बैरम और दरबा सिंह के नाम शामिल हैं.

गगोल तीर्थ में झंडारोहण और हवन

दशहरे के दिन ग्रामीण गगोल तीर्थ पहुंचते हैं. यहां झंडारोहण किया जाता है और हवन के जरिए शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है. स्थानीय निवासी हरवीर सिंह के मुताबिक, गांव के बुजुर्गों को अंग्रेजों ने जेल में बंद किया था. मुकदमे के बाद उन्हें फांसी की सजा दी गई. इसी घटना की याद में यह परंपरा आज भी निभाई जाती है.

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बेटे के जन्म पर ही त्योहार मनाने की मान्यता

गांव में एक मान्यता यह भी है कि दशहरे के दिन जिस घर में बेटे का जन्म होता है, केवल उसी घर में त्योहार मनाया जा सकता है. बाकी गांव में यह दिन शोक के रूप में बीतता है. ग्रामीण नई पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों की शहादत की कहानी बताते हैं. इस तरह गगोल में दशहरा रावण दहन के बजाय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करने का अवसर बन गया है.