सोहराब आलम, मोतिहारी। ​पूर्वी चम्पारण के मोतिहारी अंतर्गत चैलाहा गांव में दीपावली और लोक आस्था के महान पर्व छठ को लेकर चहल-पहल चरम पर है। यहां के कुम्हार परिवार इन दिनों सुबह से शाम तक मिट्टी के दीये, कलश, हाथी, ढकना और अन्य पूजन सामग्री तैयार करने में तल्लीन हैं। यह समय इन परिवारों के लिए साल भर की सबसे बड़ी उम्मीद और कमाई का अवसर होता है, लेकिन त्योहारों की इस चमक-धमक के पीछे पारंपरिक शिल्पकारों के संघर्ष की एक गहरी और मार्मिक दास्तान छिपी हुई है।

​चाक की रफ्तार और परिवार की सामूहिक मेहनत

चैलाहा के स्थानीय कुम्हारों के घरों में इन दिनों चाक की गूंज लगातार सुनाई दे रही है। परिवार का हर सदस्य इस पुश्तैनी काम में जुटा हुआ है। कोई दूर-दराज के खेतों से मिट्टी ढोकर ला रहा है, तो कोई उसे गूंधकर चाक के अनुकूल बना रहा है। पुरुष दीये और बर्तनों को सही आकार देने में लगे हैं, तो महिलाएं और बच्चे बर्तनों को सुखाने, सजाने और पकाने के कार्यों में बराबरी का हाथ बंटा रहे हैं। समय के साथ बदलाव आया है और अब पारंपरिक लकड़ी के चाक की जगह इलेक्ट्रॉनिक चाक ने ले ली है। इससे बर्तनों के उत्पादन में तेजी आई है और समय की बचत भी हुई है, फिर भी कारीगरों की आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ सका है।

​बढ़ती महंगाई और सीमित आमदनी का संकट

शिल्पकार जनमत पंडित का कहना है कि पुश्तैनी कारोबार को जीवित रखना अब किसी चुनौती से कम नहीं है। मिट्टी खरीदने से लेकर उसे पकाने के लिए ईंधन जुटाने और बाजार तक सामान ले जाने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसके विपरीत, बाजार में मिट्टी के दीयों और बर्तनों के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ पाते। लोगों का रुझान आज भी पारंपरिक चीजों की तरफ है, लेकिन वे इसके लिए उचित कीमत चुकाने से कतराते हैं। श्री पंडित के अनुसार, इस काम से साल भर में बमुश्किल इतनी कमाई हो पाती है कि परिवार का दो जून का चूल्हा जल सके। बच्चों की पढ़ाई और बेहतर जीवन स्तर की कल्पना करना इन परिवारों के लिए एक दूर का सपना जैसा है।

​पुश्तैनी पेशे से दूर हो रही नई पीढ़ी

कम आमदनी, आर्थिक तंगी और इस काम में अत्यधिक परिश्रम को देखते हुए अब चैलाहा की नई पीढ़ी इस पुश्तैनी कारोबार से किनारा कर रही है। युवा वर्ग मजदूरी, छोटे-मोटे निजी कामों या अन्य रोजगार की तलाश में बाहर जा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में यह प्राचीन कला और संस्कृति सिमट कर रह जाएगी।
​इन तमाम मुश्किलों के बावजूद, जब भी दीये की लौ जलती है, चैलाहा के कुम्हारों के दिलों में बेहतर आमदनी और अपनी मेहनत का सही मूल्य मिलने की एक हल्की सी उम्मीद जरूर जगती है।