संजय पाटीदार, भोपाल। मध्यप्रदेश में अब सियासत के निशाने पर सिर्फ राजनीतिक विरोधी ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारी भी हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ही दलों के नेताओं की नाराजगी अलग-अलग अधिकारियों को लेकर सामने आ रही है। कांग्रेस के निशाने पर रोहित सिनोनिया और दिनेश मौर्य जैसे अधिकारियों के नाम चर्चा में हैं तो वहीं बीजेपी की ओर से संस्कृति जैन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या प्रशासनिक अधिकारी राजनीतिक खींचतान का आसानी से  निशाना बनते जा रहे हैं और अगर अधिकारियों पर सियासी दबाव बढ़ता रहा तो क्या इसका असर सरकारी कामकाज और आम जनता से जुड़े कामकाज पर भी पड़ेगा।

सत्ता हो या विपक्ष…नेताओं की नाराजगी अब अधिकारियों तक पहुंच रही है। कहीं अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं तो कहीं उनके फैसलों को लेकर राजनीतिक विरोध सामने आ रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के निशाने पर रोहित सिनोनिया, दिनेश मौर्य जैसे अधिकारियों के नाम हैं। वहीं बीजेपी की ओर से नगर निगम सभापति किशन सूर्यवंशी भी संस्कृति जैन के हटाए जाने पर सोशल मीडिया में अपनी खुशी जाहिर कर चुके हैं और अजय विश्नोई जबलपुर कमिश्नर रामप्रकाश अहिरवार के तबादले पर सोशल मीडिया पर तंज कस चुके हैं। यानी सियासी लड़ाई के बीच प्रशासनिक तंत्र भी बहस के केंद्र में आ गया है।

रोहित सिसोनिया – इंदौर दूषित पानी मामले में हटाए गए थे
वर्तमान पदस्थापना – रायसेन कलेक्टर

दिनेश मौर्य – छिंदवाड़ा कफ सीरप मामले में हटाए गए थे
वर्तमान पदस्थापना – अपर आयुक्त जबलपुर

संस्कृति जैन –
वर्तमान पदस्थापना – वित्त विभाग उप सचिव

रामप्रकाश अहिरवार –
वर्तमान पदस्थापना – कमिश्नर,भोपाल नगर निगम

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी प्रशासनिक फेरबदल को अधिकारियों के प्रमोशन से जोड़कर तंज कस रहे है। कांग्रेस ने कहा इन अधिकारियों ने सरकार की नस दबा रखी है जबकि  जो अधिकारी इनकी नहीं सुन रहे हैं वो इनकी आखों की किरकिरी बन जाते हैं। बीजेपी में भ्रष्ट अधिकारियों को प्रमोशन होते हैं और ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों के तबादले किए जाते हैं।

वहीं बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों का पलटवार किया है। बीजेपी प्रदेश मीडिया प्रभारी बृजगोपाल लोया का कहना है कि जीतू पटवारी आप मध्य प्रदेश का चुनाव हार गए और पार्टी ने आपको प्रदेश अध्यक्ष बना दिया पार्टी ने आपका प्रमोशन कर दिया। आपको तो जनता ने नकार दिया। यह लोकतंत्र है जो अधिकारी-कर्मचारी सरकार की मंशा के अनुरूप नहीं चल पाएगा। उसको मैदानी पोस्टिंग नहीं देंगे और जो चल पाएगा उसको देंगे। किसी भी मामले में किसी भी आदमी को अपराधी घोषित कर देना संस्कृति नहीं है। जब तक कोई जांच में दोषी सिद्ध ना हो सिर्फ नेरेटिव सेट करने का तरीका है।

सियासत की इस लड़ाई में अब प्रशासनिक अधिकारी भी चर्चा के केंद्र में हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ही तरफ से अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर सवाल उठ रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच प्रशासनिक जवाबदेही कैसे तय होगी क्योंकि अधिकारियों पर कार्रवाई हो या उनके फैसलों की समीक्षा दोनों का आधार नियम और तथ्य होने चाहिए ताकि सियासत अपनी जगह रहे और सरकारी व्यवस्था का पहिया बिना रुकावट चलता रहे।

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