अजयारविंद नामदेव, शहडोल। जंगल के बीच एक धाम, माता का अनोखा नाम और लाल कपड़ों में बंधे हजारों नारियल, यहां कोई संतान की कामना लेकर पहुंचता है, तो कोई खोई हुई चीज मिलने की उम्मीद लेकर…स्थानीय लोगों के बीच मान्यता है कि यहां विराजमान माता को डायन माता के साथ-साथ खूनी माता के नाम से भी पूजा जाता है। नाम जितना रहस्यमयी, उतनी ही दिलचस्प इससे जुड़ी लोककथा, आखिर जंगल के बीच स्थित इस धाम की शुरुआत कैसे हुई और क्यों यहां नारियल बांधकर मन्नत मांगने की परंपरा प्रचलित है।
एक बरगद का पेड़ और पशुओं की रक्षा की गुहार
शहडोल जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर बुढ़ार जनपद पंचायत और जैतपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम भैंसाताल में स्थित डायन माता धाम की कहानी स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार करीब चार दशक पुरानी है। उस दौर में यहां घने जंगल थे और छोटी-छोटी बस्तियों में रहने वाले लोगों की आजीविका खेती, पशुपालन और दूध के कारोबार पर निर्भर थी। स्थानीय लोककथा के मुताबिक, ग्रामीण अपने पशुओं को चरने के लिए जंगल में छोड़ते थे, लेकिन कुछ पशु वापस नहीं लौटते थे। परेशान ग्रामीणों ने एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे अपने पशुओं की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की। मान्यता है कि इसी पेड़ से जुड़ी आस्था धीरे-धीरे बढ़ी और आगे चलकर यह स्थान डायन माता धाम के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

डायन माता के दरबार में क्यों बंधते हैं हजारों नारियल
इस धाम की सबसे खास पहचान यहां लाल कपड़ों में बंधे हजारों नारियल हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं और नारियल को लाल कपड़े में बांधकर परिसर में छोड़ देते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लोग संतान प्राप्ति, पढ़ाई में सफलता, खोए हुए पशुओं की वापसी और चोरी गए सामान की बरामदगी जैसी मनोकामनाओं के लिए यहां आते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु वापस पहुंचकर नारियल खोलते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-पाठ, भंडारा तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
डायन माता को खूनी माता भी कहते हैं
स्थानीय लोगों के बीच इस धाम को लेकर एक और खास मान्यता प्रचलित है। यहां विराजमान माता को खूनी माता के नाम से भी जाना जाता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। शहडोल और अनूपपुर सहित आसपास के क्षेत्रों से लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। कुछ श्रद्धालु स्थानीय परंपराओं के अनुसार बकरे और मुर्गे की बलि भी चढ़ाते हैं।

आस्था के साथ जुड़ी है एक और लोककथा, हनुमान जी है समिति का अध्यक्ष
धाम से जुड़ी जनश्रुति मंदिर समिति की स्थापना की कहानी भी सुनाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, एक दौर में जमीन पर कब्जे और आदिवासी समुदाय के साथ कथित अत्याचारों को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। इसी बीच समिति का गठन किया गया और डायन माता को उसका संरक्षक माना गया, बाद में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें समिति का अध्यक्ष बनाए जाने की बात भी स्थानीय स्तर पर प्रचलित है।
जंगल के बीच मन्नतों का अनोखा संसार
ग्राम भैंसाताल का यह धाम आज सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय लोकविश्वास और आदिवासी अंचल की परंपराओं का भी हिस्सा है। जंगल के बीच लाल कपड़ों में बंधे हजारों नारियल यहां आने वाले श्रद्धालुओं की उम्मीदों और विश्वास की कहानी कहते हैं। किसी के लिए यह डायन माता का दरबार है, तो किसी के लिए खूनी माता की आस्था। नाम की रहस्यमय पहचान और बरगद के पेड़ से जुड़ी लोककथा ने इस धाम को शहडोल के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल कर दिया है।

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