Nana Patekar Interesting Facts: नाना पाटेकर को हिंदी सिनेमा में उनकी दमदार अदाकारी, भारी आवाज और यादगार किरदारों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। लेकिन उनकी जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी था, जिसके बारे में शायद कम ही लोग जानते हैं। नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे, बल्कि नेशनल लेवल के राइफल शूटर भी रहे। उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की कई शूटिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और मेडल भी जीते।
आज यानी 8 अक्टूबर 2026 को 75 साल की उम्र में नाना पाटेकर के निधन के बाद उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से फिर चर्चा में हैं। इन्हीं में से एक उनका निशानेबाजी से जुड़ा सफर है। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने शूटिंग की शुरुआत भी किसी युवा खिलाड़ी की तरह कम उम्र में नहीं की थी। 40 की उम्र पार करने के बाद राइफल शूटिंग में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और आगे चलकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।
40 की उम्र के बाद राइफल से बढ़ी दिलचस्पी

नाना पाटेकर ने 2011 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपने शूटिंग के अनुभव के बारे में बताया था। उन्होंने बताया था कि शूटिंग प्रतियोगिताओं के पुरस्कार वितरण कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के तौर पर जाने के दौरान उन्हें अलग-अलग तरह की बंदूकें चलाने का मौका मिलता था। धीरे-धीरे उन्हें निशानेबाजी में दिलचस्पी होने लगी और उनका निशाना भी बेहतर होता गया।
नाना ने बताया था कि अभ्यास करते-करते वह छोटे से छोटे निशाने पर भी सटीक निशाना लगाने लगे थे। यहां तक कि मिनरल वॉटर की बोतल के ढक्कन जैसे छोटे लक्ष्य को भी वह निशाना बना लेते थे।
करीब 2001 के आसपास, जब वह लगभग 49 साल के थे, उन्होंने शूटिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने 50 मीटर राइफल प्रोन और 300 मीटर बिग-बोर राइफल जैसी स्पर्धाओं में भाग लिया। इसके लिए उन्होंने पुणे के बालेवाड़ी, महू और दूसरी शूटिंग रेंज में अभ्यास किया।
‘प्रहार’ के लिए सेना की ट्रेनिंग भी बनी आधार

नाना पाटेकर की शूटिंग से जुड़ी कहानी को उनकी फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ से अलग करके देखना भी मुश्किल है। 1991 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने मेजर प्रताप चौहान का किरदार निभाया था। नाना इस फिल्म के अभिनेता होने के साथ-साथ इसके लेखक और निर्देशक भी थे।
सैनिक का किरदार पर्दे पर वास्तविक लगे, इसके लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ गंभीर ट्रेनिंग ली थी। उन्होंने करीब तीन साल तक सेना के जवानों और अधिकारियों के साथ प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उन्हें सैन्य अनुशासन, हथियारों के इस्तेमाल और सैनिकों की कार्यशैली को करीब से समझने का मौका मिला।
यही अनुभव आगे चलकर निशानेबाजी में भी उनके काम आया। हालांकि शूटिंग में उनका सफर फिल्म की शूटिंग के काफी बाद प्रतियोगी स्तर पर आगे बढ़ा।
नेशनल चैंपियनशिप में जीता सिल्वर और ब्रॉन्ज

नाना पाटेकर ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया। साल 2004 में इंदौर की BSF रिओटी रेंज में आयोजित 48वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने 300 मीटर बिग-बोर स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता।
इसके बाद 2007 में महू में हुई 300 मीटर बिग-बोर नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने महाराष्ट्र की टीम का हिस्सा रहते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीता। इस प्रतियोगिता में 49 निशानेबाज शामिल हुए थे और नाना व्यक्तिगत प्रदर्शन में 13वें स्थान पर रहे। उन्होंने 600 में से 549 अंक हासिल किए थे।
यही वह प्रतियोगिता थी, जिसके बाद उन्हें ‘Renowned Shot’ का दर्जा भी मिला। यह उपलब्धि उनके लिए खास थी, क्योंकि अब वह सिर्फ फिल्मों में हथियार चलाने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि वास्तविक शूटिंग प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बना चुके थे।
नाना ने उस समय अपने प्रदर्शन को लेकर काफी आत्मविश्वास भी दिखाया था। उनका कहना था कि अगर उन्हें अपनी पसंद की नई राइफल मिल जाए तो वह 600 में से 590 अंक तक हासिल कर सकते हैं।
60 की उम्र के बाद भी नहीं छोड़ी शूटिंग

नाना पाटेकर की निशानेबाजी का सफर सिर्फ कुछ प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं रहा। वह 60 साल की उम्र पार करने के बाद भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर की शूटिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते रहे। इसके बाद भी उनका राइफल शूटिंग से लगाव बना रहा और वह अलग-अलग जगहों पर अभ्यास करते थे।
बताया जाता है कि आउटडोर शूटिंग के दौरान अगर आसपास कोई शूटिंग रेंज मिलती थी तो नाना अपना शूटिंग का सामान साथ ले जाना पसंद करते थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके लिए निशानेबाजी महज फिल्मी जरूरत या कुछ समय का शौक नहीं रह गई थी।
2011 और 2014 में भी प्रतियोगिताओं में लिया हिस्सा
नाना पाटेकर ने नवंबर 2011 में पुणे में आयोजित नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया था। उन्होंने 50 मीटर राइफल प्रोन पोजिशन स्पर्धा में भाग लिया।

इसके बाद 2014 में उन्होंने कादरपुर स्थित CRPF एकेडमी में आयोजित नेशनल ओपन शूटिंग चैंपियनशिप में भी हिस्सा लिया। इस प्रतियोगिता में देश के दिग्गज निशानेबाजों में शामिल गगन नारंग भी मौजूद थे।
इस तरह नाना का शूटिंग करियर कई साल तक चलता रहा और उन्होंने अलग-अलग स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
फिल्मों में भी दिखा शूटिंग का असर

नाना पाटेकर की शूटिंग में दिलचस्पी का असर उनके फिल्मी किरदारों में भी दिखाई देता था। ‘अब तक छप्पन’ और उसके सीक्वल में उन्होंने पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया। ऐसे किरदारों को वास्तविक बनाने के लिए उन्होंने हथियार चलाने और शूटिंग की तकनीक पर भी अभ्यास किया।
यही वजह रही कि पर्दे पर बंदूक थामे नाना का अंदाज सिर्फ अभिनय जैसा नहीं लगता था। हथियार पकड़ने का तरीका, निशाना साधने की मुद्रा और उनके किरदारों का आत्मविश्वास उनके लंबे अनुभव से अलग ही नजर आता था।
विराट कोहली के भी फैन थे नाना

निशानेबाजी के अलावा नाना पाटेकर का क्रिकेट से भी गहरा लगाव था। वह भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली के बड़े प्रशंसक थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि विराट के जल्दी आउट होने पर उनका खाना खाने का मन तक नहीं करता।
नाना ने यह भी बताया था कि बचपन में वह ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते थे और मुंबई के शिवाजी पार्क में जाकर क्रिकेट खेलते थे। यानी खेलों से उनका जुड़ाव सिर्फ शूटिंग तक सीमित नहीं था।
सैनिकों और किसानों से भी रहा गहरा जुड़ाव

नाना पाटेकर की जिंदगी में सेना और खेल के साथ-साथ समाजसेवा का भी अहम स्थान रहा। फिल्म ‘प्रहार’ के लिए सेना के साथ ट्रेनिंग लेने के बाद सैनिकों के प्रति उनका सम्मान और गहरा हुआ। कारगिल युद्ध के दौरान भी उन्होंने जवानों के बीच जाकर समय बिताया था।
किसानों के लिए भी उन्होंने काम किया। महाराष्ट्र में सूखे और किसानों की समस्याओं को देखते हुए उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ 2015 में NAAM Foundation की शुरुआत की। संस्था ने किसानों और ग्रामीण परिवारों के साथ-साथ पानी संरक्षण और गांवों से जुड़े कई मुद्दों पर काम किया।

इस तरह नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ उन किरदारों तक सीमित नहीं रही, जिन्हें उन्होंने पर्दे पर निभाया। सेना की ट्रेनिंग, निशानेबाजी की प्रतियोगिताएं, क्रिकेट का जुनून और किसानों के लिए काम—उनकी जिंदगी में ये सभी पहलू एक साथ दिखाई देते हैं।
सिनेमा में राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित नाना पाटेकर ने ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। लेकिन उनके जीवन का शूटर वाला पहलू शायद उनकी फिल्मी पहचान से भी ज्यादा अनोखा था।
एक ऐसा अभिनेता जिसने पर्दे पर कई बार बंदूक थामी, उसने असल जिंदगी में भी राइफल शूटिंग को गंभीरता से अपनाया, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उतरा और मेडल जीते। यही वजह है कि नाना पाटेकर को याद करते समय उनकी पहचान सिर्फ एक अभिनेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे शख्स की भी रहेगी जिसने जिंदगी में कई अलग-अलग किरदारों को पूरी गंभीरता से जिया।
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