कुंदन कुमार, पटना। रक्षा बंधन का यह पावन पर्व इस बार कुछ इस तरह से मनाया गया, जिसने रिश्तों की गर्माहट के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी की एक बेहद खूबसूरत मिसाल पेश की है। पर्व का यह दृश्य केवल एक औपचारिकता तक सीमित नहीं था, बल्कि यह वंचित वर्ग की उन बेटियों के चेहरों पर मुस्कान लाने का जरिया बना, जो अपने सपनों को पंख देने की जिद लिए आगे बढ़ रही हैं।
नारी गुंजन संस्था: महादलित और वंचित बेटियों के सपनों का आशियाना
राजधानी पटना में सुधा बर्गिज के कुशल नेतृत्व में संचालित ‘नारी गुंजन’ संस्था आज समाज के उस तबके के लिए उम्मीद की एक मजबूत किरण बन चुकी है, जहां तक रोशनी पहुंचाना बेहद कठिन माना जाता है। बिहार महादलित विकास मिशन और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के सहयोग से यह संस्था धरातल पर काम कर रही है। वर्तमान में इस छात्रावास में करीब डेढ़ सौ बच्चियां रहकर अपनी प्राथमिक और उच्च शिक्षा पूरी कर रही हैं। यहां इन बेटियों को न केवल पढ़ाने-लिखाने की मुकम्मल व्यवस्था मिलती है, बल्कि उन्हें एक ऐसा सुरक्षित और बेहतर माहौल दिया जाता है, जिससे वे अपनी सामाजिक और आर्थिक मजबूरियों को पीछे छोड़कर उज्जवल भविष्य की इबारत लिख सकें।
रक्षा बंधन पर जब राखी बनी जिम्मेदारी का अहसास
इस पावन रक्षा बंधन के अवसर पर नारी गुंजन के प्रांगण में एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। पटना के जाने-माने व्यवसायी चुंचुन भैया विशेष रूप से इन अनाथ और जरूरतमंद बच्चियों के बीच पहुंचे। संस्था की नन्हीं-नन्हीं और मासूम बच्चियों ने जब उनकी कलाई पर राखी बांधी, तो वह क्षण हर किसी के लिए आत्मिक संतोष से भर गया। लेकिन इस रिश्ते को महज एक धागे तक सीमित न रखते हुए, चुंचुन भैया ने इसे एक बड़ी और आजीवन जिम्मेदारी में तब्दील कर दिया।
उपहार में मिले सोफा और फर्नीचर, बच्चियों की राह हुई आसान
राखी बंधवाने के इस पवित्र अनुष्ठान के बाद व्यवसायी चुंचुन भैया ने इन बेटियों के दैनिक जीवन और पठन-पाठन को और अधिक सुगम बनाने के लिए संस्था को सोफा, आरामदायक फर्नीचर और जरूरत के कई अन्य जरूरी सामान उपहार स्वरूप भेंट किए। उनका यह उदार सहयोग इस बात का प्रमाण है कि यदि समाज के सक्षम और संपन्न लोग आगे आएं, तो वंचित वर्ग के जीवन स्तर को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। सुधा बर्गिज के संघर्ष और चुंचुन भैया जैसे दानदाताओं के सहयोग से इन डेढ़ सौ बच्चियों का जीवन अब एक नई और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहा है।
यह पूरी घटना केवल एक समाचार नहीं है, बल्कि समाज के हर उस शख्स के लिए एक संदेश है जो उत्सवों के असली मायने तलाशता है। पटना की इस घटना ने साबित कर दिया कि असली पर्व वही है जो किसी के जीवन में खुशियों के रंग भर दे और बेटियों के सपनों को मंजिल तक पहुंचाने का जरिया बन जाए।


