Navratri Special 2026 : आशुतोष तिवारी, जगदलपुर. छत्तीसगढ़ के बस्तर में देवी-देवताओं के प्रति आस्था सदियों पुरानी है. यहां की धार्मिक परंपराओं में ग्राम देवियों और शक्ति स्वरूपा माताओं की पूजा का विशेष महत्व है. ऐसा ही एक प्रमुख धार्मिक स्थल जगदलपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर बकावंड विकासखंड के गिरोला गांव में स्थित मां हिंगलाजिन माता का धाम है. अपनी भव्यता और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था के लिए पहचाने जाने वाले इस मंदिर का स्वरूप समय के साथ बदल गया है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कभी यहां छोटी-सी कुटिया और साधारण मंदिर हुआ करता था, लेकिन आज दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
Navratri Special : पीढ़ियों से चली आ रही मां हिंगलाजिन की पूजा परंपरा
गिरोला स्थित मां हिंगलाजिन माता का धाम बस्तर की स्थानीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है. यहां पीढ़ियों से माता की पूजा-अर्चना की जाती रही है. बस्तर में ग्राम देवी की आराधना का विशेष महत्व है और मां हिंगलाजिन की पूजा को भी इसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है.
मां हिंगलाजिन के नाम का संबंध पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित प्रसिद्ध हिंगलाज माता धाम से भी जोड़ा जाता है. हिंदू धार्मिक परंपरा में बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज माता मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है. हालांकि, गिरोला के मंदिर की स्थापना का इस धाम से सीधा ऐतिहासिक संबंध अभी प्रमाणित नहीं है.

Navratri Special : माता सती की कथा से जुड़ी है शक्ति उपासना की परंपरा
हिंगलाज माता की धार्मिक मान्यताओं को समझने के लिए माता सती से जुड़ी पौराणिक कथा का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है. हिंदू मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान से दुखी होकर माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे. इसके बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे. मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को कई भागों में विभाजित किया. जिन स्थानों पर उनके अंग गिरे, वे शक्तिपीठ के रूप में पूजे जाने लगे.
बलूचिस्तान का हिंगलाज माता धाम इसी शक्ति उपासना परंपरा का प्रसिद्ध केंद्र है. गिरोला में मां हिंगलाजिन की आराधना करने वाले श्रद्धालु भी उन्हें शक्ति स्वरूपा माता के रूप में पूजते हैं. हालांकि, इस पौराणिक कथा और गिरोला मंदिर की स्थापना के इतिहास को अलग-अलग समझना जरूरी है.
छोटी कुटिया से भव्य मंदिर तक बदला स्वरूप
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, मां हिंगलाजिन धाम का पुराना स्वरूप आज के मंदिर से काफी अलग था. पहले यहां छोटी-छोटी झोपड़ियां और साधारण मंदिर हुआ करते थे. समय के साथ मंदिर का निर्माण और विस्तार हुआ, जिससे इसका वर्तमान स्वरूप अधिक भव्य हो गया है.
कुछ स्थानीय लोगों के मुताबिक, पहले देवी का स्थान डीआरडीओ परिसर के भीतर हुआ करता था. बाद में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए वर्तमान स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. हालांकि, मंदिर की स्थापना, स्थान परिवर्तन और मूल प्रतिमा के इतिहास की पुष्टि के लिए पुराने दस्तावेजों और मंदिर से जुड़े लोगों की जानकारी आवश्यक है.
Navratri Special : ओडिशा से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
मां हिंगलाजिन माता के दरबार में पड़ोसी राज्य ओडिशा सहित दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर के पुजारी के बताते हैं कि यहां सालभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है. नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष उत्साह देखने को मिलता है. पंचमी और अष्टमी जैसे अवसरों पर भी भक्त विशेष रूप से माता के दरबार में पहुंचते हैं.
बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है धाम
गिरोला में स्थित मां हिंगलाजिन माता का मंदिर बस्तर की धार्मिक परंपराओं और जनआस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां माता की पूजा पीढ़ियों से होती आ रही है. समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदला है और इसकी पहचान भी व्यापक हुई है, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था आज भी इस धाम की सबसे बड़ी विशेषता है.
मंदिर की स्थापना और प्राचीन इतिहास से जुड़े प्रमाणों का दस्तावेजीकरण इस धार्मिक धरोहर को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है. मां हिंगलाजिन का यह धाम आज भी हजारों श्रद्धालुओं के विश्वास और आस्था से जुड़ा है. मंदिर का स्वरूप समय के साथ बदला है, लेकिन माता के प्रति श्रद्धा पीढ़ियों से चली आ रही है. यही आस्था इस धाम को बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बनाती है.
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