Dharm Desk : पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व भी होता है, जिसे शरद पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस पावन रात्रि को लेकर ऐसी मान्यता है कि आकाश से केवल चांदनी नहीं, बल्कि साक्षात अमृत की वर्षा होती है, क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी के सबसे निकट और अपनी सबसे शीतल अवस्था में होता है ।
सनातन संस्कृति में इस रात्रि का विशेष स्थान है। जहां करोड़ों श्रद्धालु रात्रि के समय माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं। आरोग्य प्राप्ति के लिए खुले आसमान के नीचे विशेष रूप से तैयार की गई दूध-चावल की खीर रखी जाती है। धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इस पूर्णिमा की रात का एक-एक पल अत्यंत ऊर्जावान और कल्याणकारी माना गया है।

शरद पूर्णिमा की सही तारीख और पंचांगीय गणना
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि का आरंभ और समापन कब हो रहा है। इसकी पूरी जानकारी यहां दी गई है। उदयातिथि और प्रदोष काल को ध्यान में रखते हुए व्रत और पूजन का निर्धारण किया जाता है। इसी आधार पर पूर्णिमा तिथि आरंभ 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे से होगा। पूर्णिमा तिथि 26 अक्टूबर को सुबह 09:41 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार मुख्य पर्व इस वर्ष शरद पूर्णिमा का मुख्य व्रत और उत्सव 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा, क्योंकि इस दिन प्रदोष काल में चंद्रमा का संपूर्ण दर्शन प्राप्त होगा।
चंद्रोदय का समय और दर्शन का महत्व
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के दर्शन करना और उन्हें अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन चंद्रोदय का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। सभी को पूर्णिमा के चांद के दर्शन का इंतजार रहता है। चंद्रोदय का समय को लेकर अलग-अलग जगह कुछ अंदर हो सकता है। लेकिन इस दिन शाम को लगभग 5.40 बजे चंद्रमा का उदय होगा। इस समय आसमान पूरी तरह से स्वच्छ रहता है और चंद्रमा की किरणें सीधी पृथ्वी पर पड़ती हैं। इस दौरान कम से कम 15-20 मिनट तक चंद्र दर्शन करना नेत्र ज्योति और मानसिक शांति के लिए अत्यंत लाभकारी बताया गया है।
कोजागरी पूजा विधि
शरद पूर्णिमा को ‘कोजागरी व्रत’ या ‘कोजागर लक्ष्मी पूजा’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “कौन जाग रहा है?” मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। इस दौरान शुभ मुहूर्त प्रदोष काल से लेकर निशीथ काल तक पूजा का उत्तम समय रहेगा। जो रात 11.40 बजे से 12.32 मिनट का होने वाला है।
पूजन सामग्री व विधि: इस दिन रात्रि के समय मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। घी के दीपक जलाएं, कमल का फूल अर्पित करें और कनकधारा स्तोत्र या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। जागरण करने वालों पर माता लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है।
खीर रखने का शुभ मुहूर्त
शरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे खीर रखने की प्राचीन काल से परंपरा है। खीर रखने का सही समय शाम को चंद्रोदय के बाद (लगभग शाम 7 बजे से रात 8 बजे के बाद या जब चंद्रमा अच्छे से दिखाई देने लगे) खीर खुले आसमान की चांदनी में रख सकते हैं। जब चंद्रमा अपने पूर्ण प्रभाव में हो, तब चांदी या मिट्टी के बर्तन में बनी दूध-चावल की खीर को बारीक सूती कपड़े से ढंककर छत या खुले आंगन में रखें।

