बोकारो: बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) में स्थानीय विस्थापित युवाओं के नियोजन और अधिकारों की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। टू टैंक गार्डन स्थित आंदोलन स्थल पर विस्थापित अप्रेंटिस संघ के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठीं कांग्रेस विधायक श्वेता सिंह का अनशन रविवार को नौवें दिन में प्रवेश कर गया। लगातार उपवास के बीच उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर सामने आई है। जांच में उनका ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल काफी कम पाया गया है।

नौ दिनों से जारी है भूख हड़ताल

स्थानीय विस्थापित युवाओं के हक और नियोजन की मांग को लेकर विधायक श्वेता सिंह लगातार अनशन कर रही हैं। नौ दिनों से अन्न ग्रहण नहीं करने के कारण अब उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने लगा है। रविवार को अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी कर रही है। आंदोलन स्थल पर ही उन्हें ड्रिप के जरिए तरल पदार्थ दिए जाने की जानकारी है।

भूख हड़ताल के बीच पढ़ रहीं महात्मा गांधी की आत्मकथा

आंदोलन स्थल पर विधायक श्वेता सिंह की दिनचर्या चर्चा का विषय बनी हुई है। एक ओर वे महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर नवरात्र का व्रत भी निभा रही हैं। सत्य, अहिंसा और जनहित के विचारों से प्रेरणा लेते हुए वे विस्थापित युवाओं की मांगों को लेकर अपने आंदोलन पर डटी हुई हैं।

आंदोलन स्थल पर होती है मां दुर्गा की आरती

भूख हड़ताल के दौरान विधायक सुबह और शाम आंदोलन स्थल पर ही मां दुर्गा की आरती करती हैं। इससे वहां का माहौल भक्तिमय बना रहता है। नवरात्र के दौरान अनशन और पूजा-पाठ साथ जारी रखने की उनकी दिनचर्या ने समर्थकों का ध्यान खींचा है।

स्वास्थ्य को लेकर परिजन और समर्थक चिंतित

लगातार नौ दिनों तक भूख हड़ताल पर रहने के बाद विधायक की तबीयत बिगड़ने से उनके परिजन, समर्थक और स्थानीय नागरिक चिंतित हैं। डॉक्टरों की टीम उनके स्वास्थ्य पर नजर रख रही है। दूसरी ओर, विधायक अपने संकल्प पर कायम हैं और विस्थापित युवाओं के नियोजन की मांग को लेकर आंदोलन जारी रखे हुए हैं।

विस्थापित युवाओं के नियोजन की मांग पर अड़ा संघ

बोकारो स्टील प्लांट में स्थानीय विस्थापित युवाओं के नियोजन का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। इसी मांग को लेकर विस्थापित अप्रेंटिस संघ आंदोलन कर रहा है। विधायक श्वेता सिंह भी इस आंदोलन में शामिल होकर युवाओं के अधिकारों की मांग उठा रही हैं। अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रबंधन और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत से कोई समाधान निकलता है या नहीं।