भुवनेश्वर: सामान्य तौर पर हिंदू धर्म और मंदिरों में दिए जाने वाले ‘प्रसाद’ का जिक्र आते ही मन में फल, मिठाई और शुद्ध शाकाहारी पकवानों की तस्वीर उभरती है. लेकिन ओडिशा की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में एक ऐसा रहस्यमयी और अनोखा पहलू छिपा हुआ है, जो इस सोच को एक नया आयाम देता है. राज्य के प्रमुख शक्तिपीठों में देवी दुर्गा और आद्यशक्ति के विभिन्न रूपों को मांसाहारी भोग (जैसे मछली की फ्राई, बलि का प्रसाद और पोड़ा माछ) अर्पित करने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है. तंत्र साधना और क्षेत्रीय लोक संस्कृति के अनूठे संगम को दर्शाती यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और आचार-संहिता के साथ निभाई जाती है.

मां विमला मंदिर, पुरी (जगन्नाथ धाम में वर्ष में एक बार की परंपरा)

विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी के प्रांगण में स्थित मां विमला मंदिर में एक बेहद रहस्यमयी परंपरा निभाई जाती है. यद्यपि महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी को केवल शुद्ध शाकाहारी ‘महाप्रसाद’ अर्पित किया जाता है और मां विमला रोजाना जगन्नाथ जी के उच्छिष्ट (प्रसाद) को ही ग्रहण करती हैं, लेकिन दुर्गा पूजा के समय वर्ष में केवल एक बार उन्हें मांसाहारी भोग चढ़ाया जाता है.

शास्त्रों व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाअष्टमी की रात श्रीमंदिर के कपाट बंद होने के बाद मां विमला को मार्कंडेय पोखरी (तालाब) से लाई गई मछली और तड़के अर्पित की जाने वाली बलि का विशेष भोग लगाया जाता है.

मां चर्चिका मंदिर, बांकी (मछली फ्राई और खिचड़ी)

कटक जिले के बांकी में स्थित मां चर्चिका मंदिर देवी चामुंडा का प्रसिद्ध धाम है. आठ भुजाओं वाली देवी चामुंडा का यह रूप तंत्र साधना के लिए जाना जाता है. मंदिर के सेवायत सुधीर कुमार राणा बताते हैं कि 16 दिनों तक चलने वाली षोडश उपचार पूजा के दौरान द्वितीय धूप में देवी को मछली भोग (फिश फ्राई) के साथ खिचड़ी, दलमा, साग और खट्टा अर्पित किया जाता है. यहाँ मछली का भोग केवल नवरात्रि में ही नहीं, बल्कि लगभग पूरे साल चढ़ाने की परंपरा है.

भट्टारिका मंदिर, बड़ंबा (मछुआरों की अधिष्ठात्री देवी)

अठगढ़ के पास सासंगा गांव में स्थित भट्टारिका मंदिर का इतिहास छठी से दसवीं शताब्दी के बीच का माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने यहाँ देवी दुर्गा की तपस्या कर दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए थे.

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ दशहरा और अन्य अवसरों पर गैर-ब्राह्मण पुजारी देवी को पकी हुई मछली का भोग लगाते हैं. यही कारण है कि स्थानीय मछुआरा समुदाय मां भट्टारिका को नौकायन और अपनी सुरक्षा की अधिष्ठात्री देवी मानकर पूजा-अर्चना करता है.

उग्रतारा मंदिर, टांगी (पोड़ा माछ और झड़ा बेसरा)

खोरधा जिले के टांगी ब्लॉक स्थित मां उग्रतारा मंदिर अपने आप में बेहद अनोखा है. उग्रतारा देवी को उग्र और करुणामयी दोनों रूपों में पूजा जाता है.

यहाँ देवी को रोजाना ‘पोड़ा माछ’ (अंगारों पर भुनी हुई मछली) और चूड़ा घसा का भोग चढ़ाया जाता है. दशहरा के पावन अवसर पर उन्हें विशेष रूप से ‘झड़ा बेसरा’ (सरसों के मसाले में बनी मछली की सब्जी) अर्पित की जाती है.

वाराही मंदिर, चौरासी (मत्स्य वाराही रूप)

पुरी जिले के चौरासी में स्थित 9वीं शताब्दी का वाराही मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है. यहाँ विराजमान देवी ‘मत्स्य वाराही’ की प्रतिमा के दाहिने हाथ में मछली और बाएं हाथ में कपाल (खपरैल) सुशोभित है, जो तंत्र पूजा और मत्स्य भोग के प्राचीन ऐतिहासिक प्रमाण को दर्शाता है.

मां मंगला मंदिर, काकटपुर (मछली फ्राई का विशेष भोग)

प्राची नदी के पूर्वी तट पर स्थित काकटपुर का ऐतिहासिक मां मंगला मंदिर ओडिशा के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है. दुर्गा पूजा के दौरान यहाँ मुळाष्टमी से लेकर महाष्टमी तक ‘षोडश उपचार पूजा’ का भव्य आयोजन होता है.

इस दौरान मां मंगला के ठीक नीचे विराजमान देवी दुर्गा की प्रतिमा को विशेष रूप से ‘फिश फ्राई’ (मछली फ्राई) का भोग लगाया जाता है. मंदिर के सेवायत समरेंद्र दीक्षित के अनुसार, यह भोग मुख्य गर्भगृह के बाहर देवी दुर्गा को अर्पित किया जाता है, जिसके बाद भक्तों के बीच इसे पवित्र प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है.

Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H